Sunday, October 16, 2011

काश तुम आ जाओ मनाने...


क्या ये रिश्ते इतने आसान है कि आपके बोलने से साथ छूट जाएगा
मुझे पता है कि आपको मैं पसंद नहीं
पर जो सात फेरों का बंधन है वह सिर्फ कहने को नहीं वो दिल में गहरे समा जाता है चाहे आप या मैं कितना भी इनकार करें पर यह हो ही नहीं सकता कि हम दोनों के बीच दुश्मनी हो...
जरा जरा सी बात पर गुस्सा हो जाना तीखी बातें कहना नफरत भरा चेहरा पर दिल में कहीं एक छुपी तमन्ना कि तुम एक बार आ जाओ मेरे पास...
माफ तो हर बार कर देते हैं आप
पर इस बार हिम्मत नहीं हो रही बार-बार वही नफरत दिखता है चेहरे पर
चली जाओ छोड़कर मुझे पर क्या आप रह पाएंगे मेरे बिना... चाहे मैं कितनी ही गंवार, बेकार क्यों न हूं पर ये तो मुझे भी पता है कि हम दोनों एक दूसरे के कितने करीब हैं कि अब एक दूजे के बिना जी नहीं पाएंगे और अगर जिएंगे भी तो इसी आस में कि काश तुम आ जाओ मनाने...

Wednesday, August 31, 2011

आ गई मुस्कुराहट


अपनी तारीफ किसे नहीं सुहाती यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई नकार ही नहीं सकता. आज सुबह मेरा भी मन हुआ की कोई मेरे लिए दो लफ्ज तारीफ के बोले पर... कुछ स्पेशल जो पहना था मैंने :) सबने कहा पर जिससे उम्मीद की उसने नहीं. तीन बार पूछा होगा या चार- पांच बार पर हूं हां में जवाब मिला। मुझे लगा शायद अब फोन पर... पर नाउम्मीदी के सिवा कुछ नहीं.
फिर अभी सुबह का वाकया याद आ गया जब तैयार होकर निकल रही थी घर से. भले मुंह से ना बोला हो पर आंखों में शायद कुछ था...।
क्योंकि पूछा था रुमाल है तुम्हारे पास पसीना आ रहा है
एक मुस्कुराहट आ गई मेरे चेहरे पर याद जो आ गया उनका अंदाज।

Wednesday, August 24, 2011

बचपन की याद


आज सुबह-सुबह एक बच्ची की हाथों में नंदन का सितंबर का अंक देखा तो बरबस ही मुझे अपने बचपन की याद आ गई। उस लड़की में मुझे अपनी छवि दिख रही थी। वह आंखें गड़ाए पूरे रास्ते उसी पत्रिका को पढ़ रही थी।
किताबें पढऩे का शौक मुझे बचपन से ही रहा है। पहले नंदन, चंपक चंदामामा, लोटपोट और साथ ही कॉमिक्स का भी खूब आनंद लिया है। जब कुछ बड़ी हुई तो पापा ने मेरा परिचय सुमन सौरभ से कराया वह भी मैंने खूब पढ़ा। हमारे यहां अखबार वाला हर महीने यह पत्रिका दे जाता। पापा ने पढ़ाई में मेरा खूब साथ दिया। हम जब भी गांव जाते तो ट्रेन पर एक नंदन तो मिलती ही थी मुझे मम्मी कहती एक दिन में ही खत्म मत किया करो एक एक कहानी रोज पढो पर मेरा मन नहीं मानता एक दिन क्या मैं एक से डेढ़ घंटे में ही चट कर जाती और दूसरे अंक का बड़ी बेसब्री से शुरू हो जाता इंतजार।
मम्मी कभी कभी परेशान भी होती पर पापा को मेरी इस बात पर भी गर्व ही महसूस होता की इसे दुनिया से कोई मतलब नहीं बस एक किताब मिल जाए ये बातें वे अपने मित्रों के बीच करते बाकी हम भाई-बहन तो उनके मुंह से अपनी तारीफ सुनने को तरस जाते। हां मेरी छोटी बहन इस मामले में काफी भाग्यशाली रही उसने पापा का प्यार खूब पाया शायद भगवान ने निश्चित कर रखा था की उसे 9 साल में ही पापा का उतना प्यार मिल जाए जितना मैनें 19 साल में और भाई ने 13 साल में पाया था। सच पापा उसकी हर गलती माफ कर देते कभी उसे कुछ नहीं कहते वैसे भी छोटी होने के कारण हम सब की भी लाडली थी। अरे! मैं कहां से कहां भटक आई ये सब बातें कभी और।
अभी मैंने किसी से बेनजीर भुट्टो की आपबीती यानी डॉटर औफ इस्ट का हिंदी अनुवाद पढऩे के लिए लिया। कल से ही शुरू किया है पढऩा। चाहती तो हूं की घर पर शांति से पढूं पर वक्त की इतनी किल्लत है कि आफिस आते जाते ही इस किताब के लिए समय निकाल पा रही हूं।
काफी खरे अनुभवों के बाद लिखी गई आपबीती है। जब बेनजीर लिखती हैं कि उन्हें अपनी एक साल की नन्हीं सी बच्ची को खुद से दूर करना पड़ा... कितना मर्मांतक रहा होगा वह क्षण एक मां के लिए... सोच कर ही दिल तड़प उठता है और सबसे कष्टदायक है उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को दी गई फांसी का अफसाना...। जब पढऩा इतना पीड़ादायक है तो जिस पर बीत रही होगी उसका क्या...।

Saturday, August 20, 2011

क्या हो रहा है यहां...

सब समझते हुए सरकार अनजान बन रही है। कोई 74 वर्ष की उम्र में दिनरात बिना कुछ खाए-पिए बेकार की जिद तो नहीं करेगा न...। सबके घर में बूढ़े बुजुर्ग होते हैं उन्हें तो लोग वक्त पर खाना, दवाईयां और सारी सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं यहां खुले आसमां के नीचे भूखे प्यासे अन्ना हमारे लिए भूखे हैं देश की भलाई के लिए भूखे हैं और सरकार है कि अपने नखरे अलग दिखा रही है क्यूं.
अभी-अभी प्रधानमंत्री ने कहा कि वो कुछ बोल कर विवाद उत्पन्न नहीं करना चाहते और सरकार भी मजबूत लोकपाल चाहती है तो जब लोकपाल बिल पारित करने की बात आई तो सरकार ने अपने मतलब का मसौदा लोकपाल पर थोपकर पास कर दिया क्या वह जनता के लिए नहीं है। कैसा लोकतंत्र और आजादी भारत में पनप रहा है और दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है वो भी दोगुनी रफ्तार से। इस भ्रष्टाचार के कीड़े ने सबको इतना खोखला कर दिया है कि सबकी बुद्धि कुंद हो गई है। देखते हैं कि आगे क्या होता है... कहीं इस बूढ़े शरीर को ऊर्जा मिल जाए इसी उम्मीद में....

Saturday, August 13, 2011

कहां गए तारे...

कल रात बरामदे में खड़ी हुई तो अचानक से नजर आसमां पर टिक गई। कुछ देर पहले जहां बादल ही बादल नजर आ रहे थे अब वहां बिल्कुल साफ और धुला धुला आसमान नजर आ रहा था। पूर्णिमा के एक दिन पहले की रात में चंद्रमा की सफेद और दूधिया रोशनी थी फिर अचानक मेरी नजरें तारों को खोजने लगी पर एक भी तारा नहीं ये क्या... चांद के पास जो हमेशा एक सितारा हुआ करता था वो भी नहीं। कहां गए सब के सब तभी मेरा ढाई साल का बेटा जो मेरे कंधे पर सिर टिका सोने की कोशिश कर रहा था बोला ममा चांद मां गोल गोल हैं और टवींकल स्टार कहां है...
ऐसा लगा जैसे वो भी मेरी तरह आसमां में तारे ही खोज रहा था

Monday, August 23, 2010

राखी का बंधन ही कुछ ऐसा है..

राखी का बंधन ही कुछ ऐसा है.. कि भाई की याद बरबस ही आ जाती है। बचपन में कभी सोचा भी न था कि ऐसे लड़ते-झगड़ते इतनी दूर चली जाऊंगी लड़ना तो दूर साल में एक दिन जिसपर उसका पूरी तरह हक बनता है उस त्यौहार पर भी मैं उसके पास नहीं जाऊंगी। भाई का घर जिस पर कभी मैं अपना और उसका बराबर का हक समझती वहां जाना इतना मुश्किल होगा की बस
हेलो दीदी हां भाई राखी मिली?नहीं अभी तक तो नहीं। किस कुरियर से भेजा है। कोई नहीं रुक जाओ मैं पता करती हूं फिर फोन कट..।मन उदास हो गया कल राखी का त्यौहार है और आज शाम ४.४५ तक उसे राखी नहीं मिली है। अभी उससे बात हुई उसकी भी आवाज में उदासी है।

Tuesday, June 15, 2010

चंदा मामा


चंदा मामा आ जाईए मुन्ने को सुला जाईए।
मुन्ना मेरा सो जाएगा, सपनों में खो जाएगा।।
निंदिया रानी झूला झूलाएगी, मम्मा उसको लोरी सुनाएगी।
सपने में परियां आएंगी अपने देश की सैर कराएगी।।
बचपन में मैं भी ऐसे गाने सुना करती थी अपनी मम्मी, मौसी और नानी के मुंह से
चंदा मामा दूर के, पुआ पकाए गुड़ के..
ऐसे ही एक दिन अपने बेटे को सुलाते हुए ऊपर लिखी हुई लाइनें अपने आप बन गई तो दिल ने कहा कि आपसे भी शेयर कर लूं। बताईएगा जरूर की कैसी लगी।

Tuesday, March 16, 2010

नए और पुराने पत्ते

आज अचानक बस की खिड़की से सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर नजर चली गई। नए-नए कोमल पत्ते से भरे लेकिन कई ऐसे पेड़ भी थे जिन पर वही पुराने धूल से भरे पत्ते थे वे मुझे उदास से लगे। हो सकता है यह मेरे मन का वहम हो..और कई ऐसे भी थे जिनके पुराने पत्ते तो गिर गए थे पर अभी नई और कोमल पत्तियों के इंतजार में वे खड़े हैं।
खैर जल्दी ही ये कोमल पत्ते भी धूल की आंधियों से पुराने और गंदले से हो जाएंगे। अभी गर्मी आने को ही है धूल भरी गर्म हवाएं इन पर परत दर परत धूल जमा कर देंगी और फिर इन्हें इंतजार होगा अगले साल का जब इन पर फिर से नई पत्तियों का आगमन होगा..।

Monday, March 8, 2010

एक दिन हमारा और बाकी का..!

आज लोग अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं। लोग क्या औरतें मना रही हैं अपना एक दिन। क्यों हमारा एक दिन और बाकी के दिन क्या पुरुषों के लिए। हम औरतें भी न खुद को दया का पात्र बना लेती हैं।

Friday, March 5, 2010

खुद ही मारी है कुल्हाड़ी

सच कभी-कभी लगता है कि हम महिलाओं ने अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारी है। हम चाहती क्या हैं..
पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाली महिलाएं चाहे कितना भी उनसे आगे निकल जाएं पर हमारी पुरानी जिम्मेदारियां कभी पीछा नहीं छोड़ती..। बिना मतलब ही हम इस होड़ मे लगे हैं कि हम उनसे कम नहीं क्यूं भला..।
कुछ दिनों पहले हमारे घर एक बुजुर्ग महिला रिश्तेदार का आना हुआ। उन्होंने मुझे आफिस और घर दोनों जगह संभालने कि बात पर कहा कि हमने ही आराम की जिंदगी गुजारी है तुमलोग पता नहीं कैसे दिन भर आफिस कर फिर घर भी संभाल लेते हो। हम तो घर में आराम से रहते थे कोई भाग दौड़ नहीं और पति के पैसे को आराम से खर्च करते थे।
लेकिन मुझे कभी यह भी अहसास होता है कि मैं भी कुछ हूं अगर पुरुष अपना वर्चस्व जता सकता है तो महिला भी अपना अस्तित्व जता सकती है।
मैं भी आफिस जाती हूं और मेरे पति भी पर फर्क देखिए वो आते हैं उनकी मां कहेंगी अरे कैसा थका हुआ है पानी लाओ, नाश्ता लाओ.. वगैरह।
और जब मैं पहुंचती हूं तो
आज बेटा बहुत रोया है.. कामवाली नहीं आयी है.. पानी नहीं चला है.. इसके कपड़े कहां है खाना कब बनेगा देर हो रही है..।