एक मिनट का समय लगा दिया होगा यह सोचने में। फिर जल्दी-जल्दी भागी किचन की ओर, बेटे को स्कूल जो भेजना होता है। उसके बाद अपनी और पति की तैयारी- भाग दौड़। अंतत: 8.20 पर निकल गई साथ में छाता रख लिया की कहीं बारिश में भीग न जाऊं। ट्रैफिक, भीड़ भाड़ का सामना करते हुए ऑफिस पहुंची।
राहत का सांस लिया और पानी गटक गई। तभी एक कलीग जो मुश्किल से 22-23 की होगी, आकर बोलती है आज मौसम कितना सेक्सी और सुहाना है न!
अरे, मेरे तो ध्यान में ही नहीं आया कि मौसम सुहाना हो रहा... पहले तो ऐसे मौसम में किलक उठती थी। दिल होता था कहीं घूम आऊं ...। सोचने को मजबूर हो गई- आखिर मेरे ध्यान से मौसम का सुहावनापन कहां गायब हो गया। उम्र का तकाजा है या जिंदगी की भाग दौड़ में इन सब चीजों से दूर जा रही हूं ... सुबह से सोच रही आखिर क्यों हुआ ऐसा...!
Monday, October 13, 2014
कहीं खो गया है मौसम का सुहावनापन
एक मिनट का समय लगा दिया होगा यह सोचने में। फिर जल्दी-जल्दी भागी किचन की ओर, बेटे को स्कूल जो भेजना होता है। उसके बाद अपनी और पति की तैयारी- भाग दौड़। अंतत: 8.20 पर निकल गई साथ में छाता रख लिया की कहीं बारिश में भीग न जाऊं। ट्रैफिक, भीड़ भाड़ का सामना करते हुए ऑफिस पहुंची।
राहत का सांस लिया और पानी गटक गई। तभी एक कलीग जो मुश्किल से 22-23 की होगी, आकर बोलती है आज मौसम कितना सेक्सी और सुहाना है न!
अरे, मेरे तो ध्यान में ही नहीं आया कि मौसम सुहाना हो रहा... पहले तो ऐसे मौसम में किलक उठती थी। दिल होता था कहीं घूम आऊं ...। सोचने को मजबूर हो गई- आखिर मेरे ध्यान से मौसम का सुहावनापन कहां गायब हो गया। उम्र का तकाजा है या जिंदगी की भाग दौड़ में इन सब चीजों से दूर जा रही हूं ... सुबह से सोच रही आखिर क्यों हुआ ऐसा...!
Saturday, December 7, 2013
क्या पसंद है तुम्हें...
किसी ने मुझसे पूछा क्या पसंद है तुम्हें- मैंने कहा मतलब, उसका कहना कि तुम्हारे शौक जैसे कौन सी फिल्म, कौन सा गाना, एक्टर आदि।
कुछ पल को ठहरी मैं जैसे याद करना हो क्या पसंद है मुझे...। आज कहां आ गई हूं कि अपनी पसंद का ध्यान ही नहीं...। लगातार पूछने पर जवाब तो देना ही था। सो पहला जवाब मन में आया फ्रीडम यानि आजादी। बंदिशों से दूर रहूं उड़ती रहूं आसमां में जहां मन हो वहां।
बाकी उसे बताया घूमना, किताबें पढऩा और चैन की नींद लेना।
उसने कहा बड़ा आसान है तुम्हारा शौक फ्रीडम तो हमेशा होती ही है। मैंने उसे काटा नहीं... पर इसी बात से शुरु हो गयी तकरार खुद से। ये समाज, परिवार कहां चैन की सांस ले पाउंगी। सबों के लिए सोच-सोच कर, कदम रखना कहां है मेरी आजादी मेरे मन की इच्छा कहीं नहीं है...।
Wednesday, April 17, 2013
मेरी नानी...
रोज सुबह-शाम भगवान से प्रार्थना करती हूं घर में सुख शांति बनी रहे, संपन्नता रहे। पर अभी मन में आया कि जब से अपनी गृहस्थी में आयी हूं बहुत कम ऐसा हुआ है कि अपनी बूढ़ी नानी के लिए कभी भगवान से कुछ मांगा हो। उनकी बेहतरी की कामना की हो इस अवस्था में जब उनकी जिंदगी में उनसे कोई बड़ा नहीं है उन्हें आर्शीवाद देने को तो हम छोटों को ही उनके लिए भगवान से कहना होगा कि जितनी भी उनकी जिंदगी बची है शांति से गुजरे।
मेरी नानी जिन्होंने मेरा बचपन संवारा आज उनके आशीर्वाद से मेरे जीवन में सब ठीक है उनकी जिंदगी के बचे हुए समय में मैं उनकी सेवा नहीं कर पा रही। बहुत दुख है मन में और खुद को सांत्वना देती हूं कि क्या करूं मेरा छोटा बच्चा है, परिवार है, नौकरी है... पर कहीं न कहीं दिमाग में यह बात चलती है कि यह नानी के साथ छल है, धोखा है। जब मुझे उनके पास होना चाहिए इतनी दूर हूं।
आज भगवान से दिल से प्रार्थना करती हूं मेरी नानी को स्वस्थ कर दे उनकी तकलीफें दूर कर दो भगवान। आप भी मेरी नानी के लिए प्रार्थना करें।
Tuesday, January 15, 2013
बस यादें रह जाती हैं
सोच हमें कहां कहां से घूमा के ले आती है. कहीं बैठे हैं और कहीं से घूम आते हैं. न जाने कैसी कैसी सोच
अभी ऑफिस में बैठी हूं खाली पडा कॉफी का कप एक साइड पडा है अचानक मामाजी की याद आ गयी.
मेरी यादें तो धुंधला गयी पर सब बताते हैं बचपन में मैं उनके कितने क्लोज थी. अब भी वो मुझसे उसी तरह प्यार से मिलते हैं शायद मैं उनके चहेते बच्चों में से एक हूं.
छुटपन में मैं और मेरे भाई उन्हें अंतर्देशीय में अपनी फरमाइशें लिख भेजते थे. लिस्ट काफी लंबी होती थी. उनका जवाब भी आता था. उस वक्त वो दिल्ली में पढाई के सिलसिले में रहा करते थे. कमाई तो थी नहीं सो छुटि़टयों में कुछ नहीं लेकर आते फिर भी हम खुश हो जाते थे उनसे मिलकर :)
आज वह भगवान की दया से काफी अच्छी जगह हैं और हमारी छोटी क्या बडी से बडी फरमाइश पूरी कर सकते हैं
पर फासले और रिश्ते कुछ इस कदर बदल गए कि अब हम उनसे कुछ कहने क्या एक फोन करने से पहले दस बार सोचते हैं बिजी होंगे या पता नहीं क्या सोचेंगे. मोबाइल पर नंबर सर्च करते करते एकाएक हाथ थम जाता है
किस तरह रिश्ते बदलते हैं न जिंदगी में... भाई बहन जो साथ में लडते हैं, चीजों पर हक जमाते हैं चीजें शेयर करते हैं आगे चलकर अपनी जिंदगी और जिम्मेदारियों में इस तरह व्यस्त हो जाते हैं कि रिश्तेदारों सा मिलना जुलना. जी चाह कर भी पहले की तरह सब नहीं हो पाताइसीलिए कहते हैं शायद बीता वक्त लौट कर नहीं आता
बस यादें रह जाती हैं वो भी धीरे धीरे धुंधली सी हो जाती है, पर इन यादों के साथ आंखें जरूर नम होती हैं
Thursday, August 9, 2012
तो क्या मैं भी देखूं टेढी नजर से...
Saturday, July 21, 2012
मम्मा, तकिए पर गिरा मोती
Sunday, January 15, 2012
किसी पर भरोसा करें या...

दुनिया... दुनिया अच्छी है या बुरी
कुछ लोग कहते हैं दुनिया बदल गई है। क्यूं... कभी सोचा नहीं शायद।
मेरी समझ बहुत कम है आप कह सकते हैं थोड़ी बेवकूफ टाइप। लोग अपना मतलब निकाल लेते हैं और चल देते हैं... मुझे बाद में पता चलता है। पहले तो ये भी नहीं पता चलता था।
मैंने घर के बुजुर्गों से सुना है जो जैसा होता है उसके लायक जोड़ी भगवान बना देते हैं और ऐसा ही मेरे साथ हुआ है। शुक्र है भगवान का, मेरी जिंदगी में ऐसा इंसान ला दिया जो मुझे हर राह पर इशारे करता है तुम गलत इंसान पर भरोसा कर रही हो तुम्हें धोखा मिलेगा...। काश आप मेरी जिंदगी में और पहले आते... तो जो गलतियां पहले हुई शायद वो भी नहीं होती।
अभी हाल ही की बात है उन्होंने मुझे एलर्ट किया था पर मैं झगड़ पड़ी थी पर सच सामने आने में वक्त नहीं लगा। और हकीकत से रुबरु होते ही ऐसा घुटन तड़प कि पूछिए मत।
बात छोटी सी थी पर जो खुद को चालाक समझते हैं वो किसी के साथ भी चालाकी करने से बाज नहीं आते। चाहे आपने उनका कुछ न भी बिगाड़ा हो। है हंसने वाली बात पर दिल करता है किसी से दोस्ती करने से पहले टैग लगा दूं- छोटी छोटी बात के लिए तेजी न दिखाएं प्लीज।
इस घटना के बाद दिल सोचने को मजबूर हो गया कि इंसान किसी पर भरोसा करे या...
Thursday, December 29, 2011
Saturday, December 24, 2011
गुस्सा फूटा आज...

अपने कदमों की आहटें आज पता चली...। एक अच्छा अनुभव लगा कि हां... कुछ किया।
मैं काफी इंट्रोवर्ट टाइप हूं जब तक मुसीबत बहुत बड़ी न हो आलसी हो पड़ी रहती हूं। पर आज पता नहीं क्या हो गया था मुझे। शायद उस लेडी के सपोर्ट से प्रोत्साहन मिला।
हुआ यूं कि आज आफिस के लिए देर हो रही थी... मन में आ रहा था कि पता नहीं आज नोएडा जाने के लिए क्या क्या पापड़ बेलने पड़ेंगे। एक तो शनिवार है वैसे ही कम बसें मिलती हैं। तभी बस स्टॉप पर उप्र परिवहन की बस दिखी जो धौला कुआं से नोएडा सेक्टर 62 तक के लिए आती है। इस बस को देखकर भागी। मन ही मन शनिचर महाराज को धन्यवाद कहा। बता दूं कि शनि महाराज मुझपर काफी कुपित रहते हैं।
महारानी बाग स्टॉप पर रुकते ही एक प्राइवेट बस वाला हेकड़ी दिखाता हुआ मेरी बस में चढ़ा और ड्राइवर पर चढ बैठा। इस वक्त कैसे... चलो अब सवारी बैठा ली है तो ठीक आगे बढ़ो लेकिन सेक्टर 12 पर उतार देना।
कंडक्टर ने टिकट काट कर मेरे हाथ में दिया कि सेक्टर 12 तक ही जाएगी बस। मैंने कहा कि फिर बोर्ड क्यों लगाया है 62 का... इतना बोल चुप हो गई मैं। परंतु मेरे पीछे बैठी महिला ने मुझसे ज्यादा बातें सुनाई। उसके बाद वह भी शांत हो बैठ गई।
थोड़ी देर तक मैं अपने मन में सोचती रही कब तक ऐसा चलेगा। और गुस्से से भर गया मेरा मन ।
स्साले चूडिय़ां क्यों नहीं पहन लेते तुम लोग। फेंक दूंगी बोर्ड उठा के... आज 62 तक जाओगे किसी भी हाल में वरना देखती हूं तुम लोगों को...। इसके अलावा भी बहुत कुछ।
पीछे से उस लेडी ने मुझे टोका कंपलेंट करूं फोन पर...मैंने कहा कर दो उसने फोन मिलाया पर किसी ने उठाया नहीं फिर उसने कहा पुलिस को बुलाउंगी ।
तभी कंडक्टर ने कहा खाली करो बस यहां से डिपो जाएगी मैंने सोचा उतर जाऊंगी पर इसका शीशा तो तोड़ ही दूंगी आज।
अचानक उस महिला ने उठकर खिड़की से हाथ निकाला और पुलिस पुलिस चिल्लाने लगी। बस का ड्राइवर सकते में करे तो क्या करे...। फिर बोला शांत हो जाइए आप लोगों को 62 तक छोड़ देता हूं। आखिरकार हम जीत गए थे।
फोर्टिस के पास जब वह उतरने लगी तो मैं गई और उससे हाथ मिलाया।
यहां तो बस दो थे तब ऐसा हुआ सब एकजुट हो जाएं तो दुनिया बदल जाए।
अब सोच रही हूं वो मैं ही थी जिसने इतना कुछ कहा... क्योंकि मैं ऐसे कभी बोलती नहीं :)
Monday, December 19, 2011
गुलाबी नगरी की सैर

चलना है जयपुर, आपको तो पता ही है घूमने में मेरा कितना मन लगता है... लेकिन अभी इस वक्त जाना ठीक रहेगा घर में मेहमान... मन बुझ गया। इतने दिनों बाद तो ये मौका मिला लास्ट टाइम हम मनाली गए थे उसके बाद तो... कहीं जा ही नहीं पाए।
सब मैं मैनेज कर लूंगा तुम बोलो चलना है या नहीं... ठीक है चलूंगी।
मन तो खुश था पर जाहिर नहीं करना चाहती थी अपनी खुशी, कहीं कोई बाधा न आ जाए इस खुशी में। लग रहा था जल्दी रात के बारह बजे और हम उस गुलाबी नगरी के लिए निकल जाएं। आखिर हां-ना के बीच हम निकल ही आए घर से। मेरा बेटा इतना खुश... घुमक्कड़ तो ऐसा है जैसे पूर्वजन्म में इब्नेबतूता रहा हो।
सुन तो बहुत रखा था इस शहर के बारे में देखना आज नसीब होगा सोच के दिल अजीब सी खुशी से भर गया। नींद में जैसे ठोकर लगी... आंख खुली तो इशारा किया देखो, खिड़की से बाहर ओह अरावली की पहाडिय़ां दिख रही थी बस की खिड़की से ऐसा लग रहा था जैसे जयपुर को गोद में हो मुस्कुराहट आ गई चेहरे पर नया शहर वो भी ऐसा ऐतिहासिक। मतलब मैं पहुंच ही गई पिंक सिटी। जयपुर की सुबह अच्छी लग रही थी।
शाम को चोखी ढाणी का प्रोग्राम था पूरी तरह ग्रामीण परिवेश बाजरे की रोटी मिट्टी के चूल्हे पर पकाती एक राजस्थानी महिला इतने प्यार से परोसती है कि बस दिल तो ऐसे ही भर जाता है कहीं जादू का खेल कहीं झूला और तो और राजस्थान के पारंपरिक ड्रेसेज में डांस करती लड़कियां।
उसके बाद दूसरे दिन आमेर का किला ओहो ऐसी बातें इस किले के बारे में कि लगता है उस जमाने में भी क्या लोग हुआ करते थे। महाराजा मान सिंह और उसकी रानियों की कहानी। उनकी खूबसूरती रहने सहने का तरीका कितनी पर्देदारी । इस किले में एक ऐसा सुरंग जो पता नहीं राजा ने किस उद्देश्य से बनवाया होगा। कोई आकर सारी कहानी बता दे उसमें कोई शायद न लगाए... ऐसा जी करता है मेरा।
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