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Saturday, November 15, 2025
मनुस्मृति की बातें झुठला रहीं आज की महिलाएं
मनुस्मृति को तो पढ़ा और सुना होगा। इससे पता चलता है कि किस तरह महिलाओं को गुलाम और दास बनाने की कवायद सदियों पहले शुरू की गई थी। हालांकि मनुस्मृति के लेखक को यह भान भी न होगा कि इसका नतीजा महिलाओं को बुलंदी पर ले जाएगा। आज के समय में महिलाएं चौखट के भीतर दबने के बजाए अपने दम पर दुनिया में नाम कमा रहीं हैं। यही वे महिलाएं हैं जो मनुस्मृति में लिखी गई बातों को सिरे से झुठला रहीं हैं।
अंतरिक्ष से लेकर खेल के मैदान तक हर जगह उन्हीं महिलाओं का परचम बुलंद है जिन्हें मनुस्मृति में जिंदगी भर पुरुषों की गुलामी करने का आदेश दिया गया था। शादी से पहले पिता, शादी के बाद पति और मरते दम तक संतान इन महिलाओं का मालिक होगा। पढ़ी-लिखी महिलाओं के साथ वैसी महिलाएं भी घर से निकल कर कमा रहीं हैं जो अनपढ रहीं लेकिन अपनी क्षमता का बखूबी इस्तेमाल करना जानती हैं। मेरे यहां घरेलू सहायिकाएं इसका उदाहरण हैं। ये सभी अपनी आमदनी से घर का खर्च चला रहीं हैं।
अभी के समय में पिता ही अपनी बेटियों को आगे बढ़ाते हैं और समाज में दंभ भरते हैं। उनके बल पर आगे बढ़ने वाली बेटियां उन्हीं पुरुषों के साथ जीवन बिताना पसंद कर रहीं हैं जो उन्हें सम्मान देने के काबिल हैं।
Saturday, January 28, 2017
आधी उम्र गुजर गई है...
जिंदगी की औसतन लंबाई 70 बरस मान कर चलिए क्योंंकि लेटेस्ट लाइफस्टांइल के अनुसार तो लंबाई को पूरा जी लें यही बहुत है...। इसके अनुसार आधी उम्र गुजार दी है मैंने... आज उन गुजरे क्षणों पर अनायास ही नजर चली गयी। गुजरी जिंदगी के सारे पन्ने यूं ही फड़फड़ा रहे हैं। हालांकि कहने को तो मैंने कई पन्नों को फाड़ दिया है पर वास्तव में ऐसा नहीं है। ऑरिजिनल कॉपी मेरे मस्तिष्क के किसी कोने में पड़ी है, पुराने पेज पीले हो जाते हैं पर इसकी रंगत जस की तस है, हां थोड़ी सी धूल जम गयी है और रोज पलटा नहीं जाता है इसलिए आपस में चिपके हुए से हैं।
कभी फुर्सत से इन्हें एक एक कर पलटूंगी ...पता नहीं ये वाला फुर्सत कब मिले। सोच कर हंसी सी आ जाती है। मेरी जिंदगी का हरेक पन्नान अपनी सी कहानी लिए हुए है जिसमें कई कड़वी सच्चाेइयां हैं जिन्हेंं सबके सामने पढ़ भी न पाऊं।
पता नहीं कितनी ही परतें हैं। अब लग रहा कि बस मेरी उपरी जिंदगी ही सामान्यच सी बीती है गहरे कहीं अंधकार में कितनी ही सच्चा इयां दफन हैं और जिनसे यह जुड़ी है शायद वे भी इस वाकये को स्वीकार करने से मुकर जाएं या फिर मैं ही इनपर पड़ी धूल को झाड़ना न चाहूं। मैं उन लेखक और लेखिकाओं के हिम्मत की दाद देती हूं जिन्होंने अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं। मुझमें वो हिम्मंत इस जिंदगी में तो शायद ही आए।
Monday, November 14, 2011
सॉरी मम्मी...
मां मुझको अपनी आंचल में छुपा ले
गले से लगा ले कि और मेरा कोई नहीं
अब न सताऊंगा मुझे पास बुला ले
ऊंगली पकड़ के तेरी मां मैं चला हूं
तेरे बिना मुझको अब कौन संभाले
गले से लगा ले कि और मेरा कोई नहीं
ये गाना मुझे बहुत पसंद है... आज अनायास ही याद आ गया। एक और बात है मुझे अपनी मम्मी से माफी मांगने का मन कर रहा है, सीधा-सीधा तो बोल नहीं पाऊंगी। आज मेरी एक गलती की वजह से उन्हें काफी कुछ सुनना पड़ा है... वो दुखी हैं उनकी आवाज से मालूम होता है... सॉरी मम्मी।
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