Saturday, November 15, 2025

मनुस्मृति की बातें झुठला रहीं आज की महिलाएं

मनुस्मृति को तो पढ़ा और सुना होगा। इससे पता चलता है कि किस तरह महिलाओं को गुलाम और दास बनाने की कवायद सदियों पहले शुरू की गई थी। हालांकि मनुस्मृति के लेखक को यह भान भी न होगा कि इसका नतीजा महिलाओं को बुलंदी पर ले जाएगा। आज के समय में महिलाएं चौखट के भीतर दबने के बजाए अपने दम पर दुनिया में नाम कमा रहीं हैं। यही वे महिलाएं हैं जो मनुस्मृति में लिखी गई बातों को सिरे से झुठला रहीं हैं। अंतरिक्ष से लेकर खेल के मैदान तक हर जगह उन्हीं महिलाओं का परचम बुलंद है जिन्हें मनुस्मृति में जिंदगी भर पुरुषों की गुलामी करने का आदेश दिया गया था। शादी से पहले पिता, शादी के बाद पति और मरते दम तक संतान इन महिलाओं का मालिक होगा। पढ़ी-लिखी महिलाओं के साथ वैसी महिलाएं भी घर से निकल कर कमा रहीं हैं जो अनपढ रहीं लेकिन अपनी क्षमता का बखूबी इस्तेमाल करना जानती हैं। मेरे यहां घरेलू सहायिकाएं इसका उदाहरण हैं। ये सभी अपनी आमदनी से घर का खर्च चला रहीं हैं। अभी के समय में पिता ही अपनी बेटियों को आगे बढ़ाते हैं और समाज में दंभ भरते हैं। उनके बल पर आगे बढ़ने वाली बेटियां उन्हीं पुरुषों के साथ जीवन बिताना पसंद कर रहीं हैं जो उन्हें सम्मान देने के काबिल हैं।

Friday, November 14, 2025

किसकी दिल्ली...

महाराष्ट्र की तरह ही अगर देश की राजधानी दिल्ली ने भी भेदभाव किया होता तो न जाने कितने ही लोग बगैर आसरा भटक रहे होते। करीब दो दशक से मैं यहां हूं... मानती हूं कि यहां काफी प्रदूषण है। इसे लोगों ने ‘चैंबर ऑफ गैस’ भी नाम दे दिया है। इसके बावजूद यह मेरा और न जाने कितनों का ही पसंदीदा स्थान है। शायद इसलिए ही इसे दिलों वाली दिल्ली कहा जाता है। बिहार में बाढ़ के कारण सब गंवाने वालों से लेकर मध्य प्रदेश के किसान जिन्हें खेत से खाने को नहीं मिल रहा... सभी दिल्ली आकर शुरुआत में फ्लाईओवर तले और फिर किसी तरह झुग्गियों ओर किराए के मकान में आसरा लेकर रोटी कमाते हैं। सबकी अपनी कॉलोनी है यहां आज रास्ते में एक दीवार पर पोस्टर लगी दिखी, इसपर लिखा था उत्तराखंड वालों के लिए विशेष छूट। साथ में एक तस्वीर लगी थी जिसमें पहाड़ी महिलाओं की बड़ी सी नथ पहने खूबसूरत तस्वीर लगी थी। यहां आकर अपना जहां बसाने वालों के इस पोस्टर पर भी शायद ही कोई आपत्ति जताए। ये तो उत्तराखंड की बात हुई। लेकिन यहां बंटवारे के समय जो पाकिस्तान से निकाले गए उन्हें भी इसी दिल्ली ने पनाह दी, कश्मीर से निकाले गए कश्मीरी पंडितों का गुजर बसर भी दिल्ली एनसीआर में ही हुआ। इनमें से एक कश्मीरी पंडित से व्यक्तिगत तौर पर मेरी बात हुई थी। बुजुर्ग डॉक्टर ने कोरोना महामारी से पहले ही मुझसे अपना दुख बयान किया था। उन्होंने बताया था मात्र 35 रुपये जेब में और परिवार को लेकर कश्मीर से जान बचाकर भागे थे। उस समय इसी नोएडा में उन्हें छत मिली और अब जाकर सम्मानजनक जिंदगी बसर कर रहे हैं। इसके अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, बांग्लादेश यहां तक की अफगानिस्तान के लोगों को खुशी से जीवन यापन करते दिल्ली में देखा जा सकता है। कुछ लोगों को तो ऐसे बोलते भी सुना है, हमारे गांव में तो इतना बड़ा घर है, इतना बड़ा आंगन... यहां की न सब्जी अच्छी न दूध। ऐसे लोगों से मेरा आग्रह है कि वे हम जैसों का दिल न दुखाएं। आखिर गुजारा यानी रोज की रोटी तो इसी गैस चैंबर में मिल रही है। जिसे परेशानी है, चले जाओ यहां से। न दिल्ली ने पकड़ रखा है और न ही सरकार ने।

Friday, October 17, 2025

रिश्तों को चलाने में भी दिमाग

जब रिश्ते में नई-नई आई थी, उस वक्त इतना दिमाग ही नहीं था। कोई मेरे साथ चतुराई से काम कर रहा है, या कितनी चालाकी भरे बोल अपने मुंह से निकाल रहा है। लेकिन अब करीब दो दशक बाद समझ आ रहा और हैरानी हो रही कि मैं कैसी अबोध थी। पच्चीस साल की उम्र में इतनी नासमझी...।
ये दोष शायद मेरे मम्मी पापा का था। जिन्होंने बड़े नाजों से पाला। दुनिया की चालाकियों से बचाकर... लेकिन जिंदगी भर कैसे बचाएंगे। वो भी एक बेटी को... जिसे शादी के बाद दूसरे घर चले जाना है। दिन-रात अनजान लोगों के बीच। जहां हर नजर बस उसकी कमियां गिनने में लगी है। पहनने नहीं आता, खाने की शौकीन नहीं, गहनों कपड़ों से लेना देना नहीं। लापरवाह है पूरी। यहां तक कि वॉशरूम में कितना समय लगाती है और नहाने में केवल पानी गिरने की आवाज आती है। कपड़ों में साबुन दिया करो। शादी से पहले मम्मी ने कपड़े धोए या मौसी ने, खुद तो कभी परवाह ही नहीं रही। अब घर की सफाई से लेकर दो बच्चों के कपड़े भी संवार कर रखने की जिम्मेदारी। ऑफिस में कलीग्स और बॉस की चिकचिक घर में तो पूछो मत।

Tuesday, September 16, 2025

बढ़ती उम्र के साथ नए अहसास और जज्बात

केवल किशोरावस्था या यौवन की दहलीज पर नए अहसास नहीं होते। जीवन के चार दशक पार करने पर भी नए जज्बातों और अहसासों का मेला लगा रहता है। इस उम्र में भी उम्मीदें होती हैं, सुंदर और आकर्षक लगने की। लेकिन आंटी-अंकल कहकर दरकिनार कर देती है नई पीढ़ी। सबसे पहले परिपक्व समझे जाने लगते हैं, आपसे किसी तरह की गलती की उम्मीद नहीं होती। हमेशा मैच्योर बने रहो, हर जगह हंसना नहीं। अपने से कम उम्र वालों के साथ हंसी-मजाक तो बिल्कुल नहीं करनी, लोग हल्के में लेते हैं। ऐसी न जाने कितनी ही सलाह, खासकर यदि कोई महिला हो। इन्हें कोई ये बात क्यों नहीं समझाता कि बढ़ती उम्र के साथ इच्छाएं खत्म नहीं हो जातीं बल्कि और बढ़ती हैं। क्योंकि यही उम्र है जब बच्चों के लंच, होमवर्क और किचन की चिकचिक से छुटकारा मिलता है।

Tuesday, November 7, 2023

मम्मा की कलम से...

सुबह सात बजे से एम्स हॉस्पिटल और फिर सेंट्रल मार्केट का चक्कर लगाकर वापस आते हुए मेट्रो ट्रेन में पापा की गोद में निश्चिंत भाव से सो रहे तुम्हारे चेहरे को मैं देख रही थी। अचानक मंजिल पर पहुंचने के बाद स्कूटी पर बैठे पापा के पीछे तुम्हें बैठाने लगी तो तुम्हारे जूते से पापा की ब्लू शर्ट में काला गंदा लग गया, उसे हाथों से साफ तो कर दिया मैंने, लेकिन एक ख्याल मन में घुमड़ने लगा। कल को जब मैं और तुम्हारे पापा बूढ़े हो जाएंगे और ऐसा कुछ हमसे हो जाएगा तो तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी इसपर। गुस्सा होगे और आगे से हमें अपने साथ बाहर लेकर नहीं जाओगे। ऐसा भी होगा कि हम थककर तुम्हारे या तुम्हारे दादा (Pragyan) के कंधे पर अपना सिर रखकर उसी निश्चिंतता को तलाशेंगे जो अभी तुमदोनों को दे रहे हैं। फिलहाल तो ऐसे हालात हैं कि जिनके दो बेटे हैं- वो किस्तों में अपने मां बाप को रख रहे हैं- छह माह एक तो छह माह दूसरा। ईश्वर ने साथ दिया तो हम दोनों यानि तुम्हारे मम्मी-पापा कभी भी तुम दोनों भाइयों से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखेंगे और न ही तुम्हारे व्यक्तिगत मामले में दखल देंगे। जरूरी लगे तो अपनी सलाह दें दे। केवल तुमलोग हमें प्यार और सम्मान देना और कुछ नहीं चाहिए।

Monday, October 2, 2023

मेरी हर गलती को कैसे माफ कर देती हो मम्मी....

बचपन में बचाती थी, इसलिए जैसे ही आभास होता कि पापा डांटने वाले हैं, मम्मी के पीछे पहुंच जाती। डांटती मम्मी भी थी लेकिन तुरंत लाड़ जताने भी आ जाती थी। आज खुद मम्मी बन गई हूं, लेकिन कहीं से कोई बोल दे, डांट दे, तो मम्मी की ही याद आ जाती है। ईश्वर उन्हें मेरे लिए सेहतमंद बनाए रखे। दुनिया में एक मम्मी ही तो है जिसे कुछ भी कह लो... डांट के बोल दो, फोन मत उठाओ, कभी सेकेंड भर में बोलो - मम्मी बिजी हूं, फ्री होकर फोन करती हूं। चाहे उस दिन मत ही करो फोन लेकिन वो सारी गलती भूल जाएंगी और फोन कर पूछेंगी क्या हाल...

Thursday, September 21, 2023

आधी आबादी को मिलेगा इस आरक्षण का फायदा...

कहने को तो प्रधानमंत्री ने महिलाओं के हक में कई फैसले लिए, कई अधिकार दिए। लेकिन क्या इसका फायदा आधी आबादी को मिल पा रहा है। पहले से ही ऐसा सुनती आई हूं कि विरोध या क्रांति के सुर या तो हाई क्लास या फिर लोअर क्लास में ही सुनाई दे सकता है। मिडिल क्लास तो न इधर के न उधर के। हां कुछ एक्सेप्शन हो सकतीं हैं इस क्लास में, लेकिन अधिकतर महिलाएं अपना सम्मान, मां बाप की प्रतिष्ठा, परिवार की भलाई सोचती रह जाती हैं। इससे भी न हुआ तो उनके उठते कदमों की बेड़ी उनके बच्चे बन जाते हैं। और ये जिंदगी भर अपनी आवाज उठा नहीं पातीं। अब आरक्षण मिलने के बाद भी हमारी आधी आबादी में से कितनी फीसद महिलाएं अपना सुर ऊंचा कर सकेंगी।

Wednesday, February 1, 2023

समझ में आने लगा है- "अनुभव" किसे कहते हैं

अब मैं भी कहती हूं यूं हीं धूप में सफेद नहीं हुए हैं मेरे बाल। चेहरे पर नासमझी और मासूमियत नहीं बल्कि दिखने लगी हैं समझ और अनुभव की लकीरें। जिंदगी के सफर में अनुभव किसे कहते हैं, अब यह समझ में आने लगा है। हालात के साथ सामने वाला किस अंदाज में बदलता है इसके भी अनेकों उदाहरण मिल चुके हैं अब तक। कोई फोन नहीं उठाता या फिर किस तरह प्रतिक्रिया देता है अब इसके पीछे का मतलब तुरंत समझ आ जाता है। सभी की उम्मीद पर खरा उतरने की कोशिश करते-करते थकान सी महसूस होने लगी है। अब तो सीधा दिमाग में आता है् ...में जाओ। 40 के करीब पहुंच चुकी हूं और एक निश्छल प्यार अपनी सगी मां का ही दिखता है जिसमें कोई स्वार्थ नहीं, न किसी तरह का छल और न ही दिखावा। कितनी ही झल्लाहट के साथ बोल दूं वो कभी नाराज नहीं होती न ही दिल से उन बातों को लगाती है। उल्टा उनके दिल में मेरे लिए सहानुभूति आती है कुछ देर बाद फिर फोन कर पूछती हैं सब ठीक है न। भगवान उनको सेहतमंद रखे और उनका आशीर्वाद हम भाई बहनों पर सदैव बनाए रखे।

Tuesday, December 3, 2019

इस तरह कोई अपना गया होता तो...


हर दिन ऐसी कई घटनाएं होती होंगी... किसी घर के कोने में, कहीं सुनसान इलाके में किसी मजबूर मासूम के शरीर को दरिंदे नोच रहे होते हैं... सोच कर देखिए इस कदर कोई अपना गया होता जैसे हैदराबाद में एक युवती चली गई...। हाय उन दरिंदों की इंसानियत कहां होती है अपनी मां, बहन, बेटियों की आंखें, मुस्कुरराते चेहरे नहीं दिखते होंगे।
किसी का ट्वीट आज सुबह पढ़ा। इस ट्वीट को पढ़कर ऐसा लगा कि कानून बनाने वालों के दिमाग में ये बातें क्यों नहीं आती हैं। बड़ा अहम संदेश देने वाले इस ट्वीट में लिखा था- 6 माह, 2 साल, 7 साल, 10 साल, 17 साल की मासूम बच्चियों से दुष्कर्म होता है तो दोषियों को सजा देने वक्त‍ उनके उम्र का ख्याल क्यों, जब उन्हें दुष्कर्म करने आता है तब तो वे वाकई मैच्योर होंगे फिर सजा के हकदार क्यों नहीं। सऊदी अरब में इस कुकर्म की सजा है- सिर कलम करना।
आज ऐसी ही सजा मिलनी चाहिए हर उस पापी और दुष्कर्मी को जो ऐसा करते वक्त तनिक भी अपनी मां बहन का चेहरा नहीं याद करता।
कल्पाना करके सिहर जाती हूं मैं। किसी अपरिचित का रास्ते में, बस-ऑटो में छू जाना मुझे इरिटेट कर जाता है कैसे उस हैवानियत में शरीर को तार-तार करने करने दे सकती है कोई लड़की... उफ भगवान कहां होते हो तुम उस वक्त...।


Tuesday, August 28, 2018

अनुभवों का बखान



सोचा कि आज अपने अनुभवों की बखिया उधेरूं....। आज इस बात का सौ फीसद दावा करती हूं कि मैंने अपने अनुभवों से काफी कुछ सीखा है। कई कमियां हैं मुझमें। सबसे बड़ी कमी है लोगों की पहचान करनी नहीं आती। दूसरा मैं बड़ी वाली ‘स्लोी प्रोसेसर’ हूं क्योंबकि जवाब तो आता है पर देर से।
बता दूं कि ‘स्लो‘ प्रोसेसर’ शब्द की एक अलग कहानी है मेरे पास... किसी दोस्त ने ये उपाधि दी थी मुझे। इसके अलावा अनगिनत कमियां भरी हैं मुझमें...। लोग कहते हैं मैं बदल गई हूं, उनके प्रति मेरा बिहेव काफी बदल गया है। इनसे मैं क्या कहूं क्या सफाई दूं... काश की उनसे कह पाती।
दरअसल, मैं बदली नहीं हूं अब जाकर उनकी वास्तविकता मेरे सामने आई है। मैं उन्हें पहचान गई हूं...। उनका झूठी हंसी, सहानुभूति, दिखावे का प्यार, नकली भरोसे के अंदर छिपा छलावा सबको मेरी नजरें अब ण्‍क्‍स रे मशीन की तरह देख रही है। पर डर लगता है कि कहीं इस कारण सच्चा प्यार और भरोसा भी मुझे नकली न लगने लगे।
मेरे साथ दिक्कत इस बात की है कि एक बार अगर कोई मेरी नजरों में गिरा फिर उससे हाय, हैलो तो दूर चेहरा देखना भी पसंद नहीं करती। पर ये कंडीशन और जगहों पर तो चल जाती है लेकिन फैमिली में... सब जानते हुए भी ऐसे लोगों के लिए दिल को मजबूत करना पड़ता है और जबरन उनका चेहरा देखना और रिश्तों को अहमियत देते हुए सम्मान करना मजबूरी हो गई है। कोई दूसरा ऑप्शन नहीं है न इसके लिए अगर आप इसे पढ़ रहे हैं और बता सकते हैं तो प्लीज कमेंट में बताएं... इंतजार कर रही हूं।

Saturday, August 11, 2018

काश! कड़वी यादें बदल पाती मीठी यादों में...



कुछ लोगों के नाम से ही मुंह कसैला सा हो जाता है। उनसे जुड़ी कड़वी यादें दिमाग पर हथौड़े की तरह चोट करने लगती है। कल रात मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। हैं तो वो लोग काफी अपने लेकिन उनसे जुड़ी अच्छी़ यादें हैं ही नहीं मेरे रिकार्ड में कहीं भी।
नींद आंखों से कोसों दूर हो गई और वही सब दृश्यो सामने आने लगे। कानों में उनकी व्यं‍ग्य वाली आवाजें गूंजने लगीं। कितनी भी कोशिश की कि उनकी अच्छी बातें याद करूं पर कुछ है ही नहीं। दिमाग को झटकार कर सोने की भी कोशिश की पर ‘न’। जिद्दी दिमाग में एक बार कीड़ा घुस गया तो फिर किसकी हिम्मत कि उसे निकाल-बाहर करे।
दिल ही नहीं करता ऐसे लोगों के लिए कुछ करने का... पर मजबूरी ऐसी है कि न उन्हें छोड़ते बनता है न ही उन्हें नकारते।

Tuesday, November 28, 2017

एक कान से सुनिए और दूसरे से...



शो यानि दिखावा करना सबके बस का नहीं ... और मेरे तो बिल्कुल नहीं। पर जमाने के साथ चलते हुए इसकी कमी मुझे काफी खलती है। क्यों कि हर जगह इसकी जरूरत मुझे मुंह चिढ़ाती सी दिखती है।
कुछ दिनों पहले ही हमारी जानने वाली एक महिला हमसे टकराईं। यहां बता दूं कि वे खुद काफी टिप टॉप में रहती हैं यानि हमेशा बाल संवरे रहते हैं, आंखों में काजल होती है, होंठों पर लाल लिपस्टिक का रंग और कुल मिलाकर खूबसूरत भी हैं वो। शायद इसलिए किसी पर भी टिप्पणी करने का मौका अपने हाथों से जाने नहीं देती। जाहिर सी बात है मुझसे मिलते ही उन्हें अनगिनत मौके मिल जाते हैं।
ये सब भी इंटरटेनमेंट का हिस्सा है जो बोरियत भरी जिंदगी में हंसने का मौका देता है। इसलिए ही सोचा की आप सब के साथ शेयर करूं ताकि आप भी थोड़ा हंस लें। कुछ दिनों पहले ही वो मुझसे मिली थीं और मेरे ड्रेस से लेकर रबड़बैंड तक पर कमेंट कर दिया था। जैसे – वो हो सासू मां बाहर गयी हैं तो फैशनेबल ड्रेस डाल रही... रबड़बैंड तो मम्‍मियों के जमाने का लगाया है आपने... कहां से लायीं...। मुस्कुराती हुई मैं वहां से अपने काम के लिए आगे बढ़ गयी।
हालांकि शुरुआत में उनकी बातें बुरी लगी थी पर अब एक कान से सुनती हूं और दूसरे से निकाल देती हूं। उससे भी नहीं होता तो उनके जाते ही हवा में फूंक मारती हूं जोरदार ... नहीं समझे ... अरे, उड़ा देती हूं हवा में। जी हां हवा में। वैसे भी दिल्लीे की हवा अब साफ सुथरी कहां है।

Friday, October 13, 2017

बाज नहीं आओगे अपनी चालबाजियों से




ओह्ह चालबाजियां नहीं नादानियां हैं ये...
सामने वाला सोचता है कि उसकी चालाकी कोई नहीं समझ रहा...
कहां हो तुम, किस दुनिया में जी रहे हो...
सब समझ रहे हैं हम, तुम्हारी एक-एक चाल से वाकिफ हैं
जुदा है ये.. कि सब समझते हुए भी हमने तुम्हारी इस बेवकूफी का जवाब नहीं दिया
लेकिन जान लो कारण ऐसा कर उस निचले पायदान पर नहीं आना चाहते जहां तुम खड़े हो
कुछ नहीं कहते इसका मतलब बेवकूफ नहीं हैं हम...
अपने इर्द गिर्द तुम जैसे लोग ही तो भरे पड़े हैं काफी कुछ सीख लिया है
अब हंसी आती है कभी-कभी तुम जैसे लोगों की नादानियों पर सबको खाली हाथ ही जाना है...
फिर भी इल्तजा है मेरी- बची-खुची जिंदगी को दोजख न बनाओ।

Tuesday, July 25, 2017

भीख मांगने वाले भी देने लगे हैं धमकी...



भागा जा रहा है, क्यों भागा जा रहा है, एक-दो रुपया नहीं दे सकता क्या ... इन शब्दों के कानों में पड़ते ही, ध्या‍न टूटा तो देखती हूं कि 30-32 साल का एक शख्स अजीब से कपड़े पहने ऑटो ड्राइवर को धमकी सा दे रहा है।
यह दृश्य नोएडा सेक्टर 62, सुबह करीब 9 बजे का है जब मैं ऑफिस के लिए निकली। सवारी को उतारने भर के लिए ऑटो रुकी थी और फिर जैसे ही स्टार्ट हुई, सिर पर काला कपड़ा लपेटे,काले रंग का 30 के आसपास उम्र वाला एक शख्स लगभग डांटने के अंदाज में बोला, ‘भागा जा रहा है, भागा जा रहा है... ऑटो ड्राइवर को लगा शायद उसे भी जाना है इसलिए ऑटो रोक रहा है। लेकिन अगले ही पल ड्राइवर का भ्रम टूट गया जब उसने हाथ पसारते हुए कहा- एक दो रुपया तो देता जा। ड्राइवर समेत ऑटो पर सवार हम सवारियों को भी तेज हंसी आ गयी, शायद उन्होंने भी पहली बार इस तरह किसी को भीख मांगते देखा हो।

भीख मांगने वालों को आजतक मैंने रोते, गिड़गिड़ाते, दुआएं देते सुना था पर आज गुस्सें में पैसे मांगते देख हैरान रह गयी। ऑफिस आने के क्रम में करीब दस मिनट ऑटो और फिर रिक्शे़ का रास्ता है। सुबह इतनी हड़बडी होती है...। पर आज बार-बार यह दृश्यो मेरे आंखों के सामने आ रहा है तो सोचा अपने ब्लॉग में इसे दर्ज ही कर लूं।

Friday, July 14, 2017

न्यूट्रल होना चाहती हूं मैं...



अब आपकी तारीफ से मुझ पर कोई असर नहीं होता मतलब न निगेटिव न पॉजिटिव। न्यूट्रल वर्ड से वाकिफ ही होंगे chemistry में पढ़ा हो शायद और यदि नहीं पढ़ा तो मैं बता देती हूं, जिसपर किसी भी केमिकल रिएक्शकन का कोई असर नहीं होता उसका अपना अस्तिरत्व होता है बिल्कुल न्यूट्रल सा।
वैसे भी आपके और आपके पूरे परिवार से मैंने आज तक अपने लिए तारीफ के बोल बिल्कुल भी नहीं सुना है और अगर सुना भी है तो वह बेमतलब नहीं होता। यानि उसके पीछे कोई कारण होता है, या तो मुझे खुश करवाकर अपना काम साधना या फिर कोई काम करवाना।
खैर, अक्सर पत्नियां अपने पति से तारीफ सुनती हैं और खुश होती हैं, लेकिन मैं अपवाद हूं शायद। मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ कभी भी। हां हाल का एक वाकया याद है कि आपके सामने ही आपकी एक जूनियर कलीग लड़की ने मेरी तारीफ की थी, जिसपर आपने कहा अरे, किसी के सामने उसकी तारीफ नहीं करते। मैं बिल्कुील चौंक गयी थी उस पल को क्योंहकि दस साल होने को आए शादी के... अब तक आपने नहीं पहचाना मुझे तो अब क्या् पहचानेंगे। बस उस पल ही दिल से उम्‍मीद की वो डोर भी तोड़ दी जिसकी चाह थी कि कभी तो आप मेरे होंगे।
अब मैं खुश हूं तारीफ किया नहीं किया सब बराबर मेरे लिए। अब कोई उम्मीद नहीं रखना चाहती मैं आपसे और न आपके परिवार के किसी व्यक्ति से। बस रहना है आपके घर में जहां हर सांस पर यह अहसास दिलाया गया है कि तुम्हें ये करना है, ये नहीं करना है, इससे बात करनी है, इससे नहीं करनी है, ये खाना सही नहीं है...उफ कहीं पढ़ा था लड़कियों को जिंदगी में अपना घर नहीं मिलता चाहे वह सब कुछ न्यौैछावर क्यों न कर दे। अब इस बात का अहसास हो चला है।
इस पोस्ट को लिखते लिखते गले में एक गोला सा अटका हुआ मालूम हो रहा है, आंखों में पानी सा आ रहा है और जलन भी शायद नींद पूरी नहीं हुई है न इसलिए।

Tuesday, July 4, 2017

अब तक नहीं चिल्‍ला पायी...


आज सुबह जब जगी तो अलसाया सा मन हो रहा था पर सूरज की लाली आसमां पर दस्त क दे चुकी थी। एक मिनट की भी देरी करूं तो पता नहीं किसका क्या छूटे और कहां देर हो। बेटे का स्‍कूल , पति का ऑफिस और फिर मेरा ऑफिस... इसलिए आलस्य को त्याागने के लिए एक प्याली चाय ली और सोफे पर बैठ गयी।
खाली मन पता नहीं कहां कहां उड़ानें भरने लग जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ भी। बैठी तो थी सोफे पर मन के भीतर कुछ ऐसे लोग याद आए गए जिनकी एक भी बात याद करो तो मन अजीब हो जाए तभी मैंने अपने ख्यालों को झटके से उतार फेंका और सोचा- नहीं नहीं, सुबह ऐसे लोगों के साथ नहीं। दिल को समझाया कुछ अच्छा सोचो किसी अच्छे पल को याद करो। ऐसे इंसान के बारे में सोचो जिससे होठों पर मुस्कान आए दिल खुश हो और सुबह सुहानी हो जाए।

फिर दिमाग ढूंढने लगा ऐसे पल... मिल भी गए ऐसे लोग जो मेरा भला ही सोचते होंगे लेकिन उनकी खुशी के बजाए उनकी मौजूदा स्थिति से दिल दुखी हो गया। आस-पास कोई खुश नहीं दिखा। सब किसी न किसी चीज के लिए परेशान ही दिखे। क्यों हुआ ऐसा समझ नहीं आता...

प्याली की चाय के साथ सोचने का वक्‍त भी खत्म हो चला था, जुट गयी अपनी रोजमर्रा के काम में। लेकिन दोपहर के एक बज रहे हैं फिर से दिमाग में वही कोलाहल है कहां हैं खुश और सुखी लोग... सब ऊपर से हंसते हैं दिखावे की खुशी है आज सबके पास। मैं हर चीज समझती हूं... उनकी दिखावे की खुशी में मैं भी दिखावे की हंसी हंस लेती हूं पर मेरे मन के एक कोने में भी कचरा भरा पड़ा है।
कभी किसी ने मुझसे कहा था... तुम एक बार खुलकर चिल्लाओ अब मुझे लग रहा हर किसी को चिल्लाने की जरूरत हो गयी है। मन के भीतर जमी दर्द और दुख की परत शायद चिल्लाकर निकल जाए। अगर आप मेरा पोस्ट पढ़ रहे हैं तो आप भी एक बार खुलकर चिल्लाइए फिर देखिए मन कैसा हल्का‍ सा हो जाता है पर ये चिल्लाना भारी काम है बहुत भारी.... मैं अब तक चिल्‍ला नहीं पायी हूं

Saturday, January 28, 2017

आधी उम्र गुजर गई है...


जिंदगी की औसतन लंबाई 70 बरस मान कर चलिए क्योंंकि लेटेस्ट लाइफस्टांइल के अनुसार तो लंबाई को पूरा जी लें यही बहुत है...।
इसके अनुसार आधी उम्र गुजार दी है मैंने... आज उन गुजरे क्षणों पर अनायास ही नजर चली गयी। गुजरी जिंदगी के सारे पन्ने यूं ही फड़फड़ा रहे हैं। हालांकि कहने को तो मैंने कई पन्नों को फाड़ दिया है पर वास्तव में ऐसा नहीं है। ऑरिजिनल कॉपी मेरे मस्‍तिष्क के किसी कोने में पड़ी है, पुराने पेज पीले हो जाते हैं पर इसकी रंगत जस की तस है, हां थोड़ी सी धूल जम गयी है और रोज पलटा नहीं जाता है इसलिए आपस में चिपके हुए से हैं।

कभी फुर्सत से इन्हें एक एक कर पलटूंगी ...पता नहीं ये वाला फुर्सत कब मिले। सोच कर हंसी सी आ जाती है। मेरी जिंदगी का हरेक पन्नान अपनी सी कहानी लिए हुए है जिसमें कई कड़वी सच्चाेइयां हैं जिन्हेंं सबके सामने पढ़ भी न पाऊं।

पता नहीं कितनी ही परतें हैं। अब लग रहा कि बस मेरी उपरी जिंदगी ही सामान्यच सी बीती है गहरे कहीं अंधकार में कितनी ही सच्चा इयां दफन हैं और जिनसे यह जुड़ी है शायद वे भी इस वाकये को स्वीकार करने से मुकर जाएं या फिर मैं ही इनपर पड़ी धूल को झाड़ना न चाहूं। मैं उन लेखक और लेखिकाओं के हिम्मत की दाद देती हूं जिन्होंने अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं। मुझमें वो हिम्मंत इस जिंदगी में तो शायद ही आए।

Friday, January 27, 2017

नन्हे से फरिश्ते...


यादें धुंधली होती जा रही हैं। आज से ठीक चार माह बाद तुम आठ साल के हो जाओगे। तुम्हारे बचपन की उतनी बातें तो याद नहीं हैं मुझे, पर वो पल नहीं भूली जब पहली बार मुझे ऑपरेशन थियेटर में ही नन्हे से फरिश्ते को दिखाया था। और शायद जब तक जिंदगी है तक तक उस क्षण को भूल नहीं सकती। हरे रंग के टॉवल में गुलाबी रुई से रंगत वाला वह नन्हा मुन्ना लिपटा हुआ था।
ऑपरेशन थियेटर में बेड पर मुझे लिटा दिया गया...पेट पर से पर्दा डाल दिया। आधा अंग सुन्न कर दिया था पर मैं होशो हवास में थी। डॉक्टरों की आपसी बातचीत कान में पड़ रही थी तभी दूर से कही बच्चे के रोने की आवाज आयी। बेचैन सी मैंने डॉक्टर से पूछ डाला क्या है- मेरा मतलब था लड़का या लड़की। इतने दिनों से सस्पेंस जो बना था। डॉक्टर के हंसने की आवाज आयी रुको बेटा अभी पता चल जाएगा तुम्हें ।
इतना तो अहसास हो गया था कि भगवान ने मेरी झोली को भर दिया है। तभी हरे रंग के टॉवेल में लिपटा एक सुंदर सा नन्हाे मुन्ना बच्चे को मेरे पास ले आए और कहा देख लो... ‘गेस करो क्या है...’ मेरे होठों पर हंसी थिरक आयी मैंने कहा- ‘बेटी’ चूंकि दिल से चाहत थी कि बेटी आए। डॉक्टर ने कहा- उहूं ‘बेटा’। मैंने कहा ‘कोई ना, सुंदर है...’ और मुस्कुरा दी।
आज आठ साल होने को हैं पर तुम और प्यारे होते जा रहे हो... तुम्हारे बिना जीना मुश्किमल हो गया है अब भगवान तुम्हें मेरी आयु भी लगा दे, सारी खुशियां तुम्हें मिले... अच्छे इंसान बनो... कामयाबी कदम चूमे।
तुम्हारी मम्मू

Friday, January 8, 2016

पता नहीं कौन सी मजबूरी...


कौन है जो रोक लेता है राह, जब भी होती है पार जाने की चाह। एक लहर है जो सीने में है दबी, कभी कभी आता है उसमें उफान पर कोई है...यहां... इसी दुनिया में... मेरे आस-पास जिसने अटका रखा है... न निकलने पाती हूं... न समाने पाती हूं कब तक रहूंगी इस कदर... शायद यह खुद का बहाना है... न जाने का बाहर या पता नहीं कौन सी मजबूरी...

Friday, January 1, 2016

बीत गया एक साल और...


बीत गया एक साल और। हमेशा की तरह कुछ यादें जुड़ गयीं हमारी जिंदगी की डिक्‍शनरी में। आज से नया साल शुरू हो गया है। आप सभी को नये साल की ढेर सारी शुभकामनाएं। कल से ही फोन पर मैसेजेस की झड़ी सी लगी है। पर पता नहीं क्‍यों मेरा दिल इन सब मामलों में इतना उत्‍साहित क्‍यों नहीं है। लोग सेलिब्रेशन के लिए मौके तलाश रहे हैं पर मैं नहीं। मेरी चाहत है तो बस आराम से बैठने को कुछ पल मिल जाए... पर यह तो होने से रहा अब। आज गिने चुने लोगों को ही नये साल पर शुभकामनाएं देने को फोन किया वह भी पारंपरिक तौर पर आवश्‍यकता है इसलिए नहीं तो शायद यह भी नहीं करती बस अपनी मम्‍मी से बात करती और भाई-बहन से बस। दिल ही नहीं करता किसी से बात करने का। दो मिनट के लिए बात भी करूं तो उसमें कमेंट्स सुनने को मिल जाते हैं। इसलिए मेरा मन नहीं करता किसी से बात करने का। आज सुबह सुबह पता नहीं क्‍यों बीते वर्ष की झलक आंखों के सामने घूम गयी। काफी दौड़ती भागती रही हूं मैं इस साल, और अहसास भी नहीं मुझे, कहीं खुद के बारे में सोचना तो नहीं बंद कर दिया मैंने। खैर कोई नहीं आस पड़ोस खुश रहे तो आप भी खुश रहते हैं। और मेरी कोशिश रहती है कि खुश ही रहें सब लोग पर इस साल ने मुझे यह नया अनुभव दिया कि अब इतने से अगर कोई खुश नहीं तो अब इससे अधिक मैं कुछ नहीं कर सकती यानि सैचुरेशन प्‍वाइंट आ गया है। अब खत्‍म सब...। इसलिए नये साल में मैं खुद को शुभकामनाएं देती हूं, मुझे भगवान इंसानों को पहचानने की ताकत दे, लिहाज और आदर की वजह से जिन लोगों की गलत बातों का विरोध नहीं कर पायी हूं अब तक वो इस नये साल पर कर सकूं यानि स्‍वयं का भी अस्‍तित्‍व बनाउंं।