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Saturday, December 7, 2013

क्या पसंद है तुम्हें...

किसी ने मुझसे पूछा क्या पसंद है तुम्हें- मैंने कहा मतलब, उसका कहना कि तुम्हारे शौक जैसे कौन सी फिल्म, कौन सा गाना, एक्टर आदि। कुछ पल को ठहरी मैं जैसे याद करना हो क्या पसंद है मुझे...। आज कहां आ गई हूं कि अपनी पसंद का ध्यान ही नहीं...। लगातार पूछने पर जवाब तो देना ही था। सो पहला जवाब मन में आया फ्रीडम यानि आजादी। बंदिशों से दूर रहूं उड़ती रहूं आसमां में जहां मन हो वहां। बाकी उसे बताया घूमना, किताबें पढऩा और चैन की नींद लेना। उसने कहा बड़ा आसान है तुम्हारा शौक फ्रीडम तो हमेशा होती ही है। मैंने उसे काटा नहीं... पर इसी बात से शुरु हो गयी तकरार खुद से। ये समाज, परिवार कहां चैन की सांस ले पाउंगी। सबों के लिए सोच-सोच कर, कदम रखना कहां है मेरी आजादी मेरे मन की इच्छा कहीं नहीं है...।

Wednesday, April 17, 2013

मेरी नानी...



रोज सुबह-शाम भगवान से प्रार्थना करती हूं घर में सुख शांति बनी रहे, संपन्नता रहे। पर अभी मन में आया कि जब से अपनी गृहस्थी में आयी हूं बहुत कम ऐसा हुआ है कि अपनी बूढ़ी नानी के लिए कभी भगवान से कुछ मांगा हो। उनकी बेहतरी की कामना की हो इस अवस्था में जब उनकी जिंदगी में उनसे कोई बड़ा नहीं है उन्हें आर्शीवाद देने को तो हम छोटों को ही उनके लिए भगवान से कहना होगा कि जितनी भी उनकी जिंदगी बची है शांति से गुजरे।
मेरी नानी जिन्होंने मेरा बचपन संवारा आज उनके आशीर्वाद से मेरे जीवन में सब ठीक है उनकी जिंदगी के बचे हुए समय में मैं उनकी सेवा नहीं कर पा रही। बहुत दुख है मन में और खुद को सांत्वना देती हूं कि क्या करूं मेरा छोटा बच्चा है, परिवार है, नौकरी है... पर कहीं न कहीं दिमाग में यह बात चलती है कि यह नानी के साथ छल है, धोखा है। जब मुझे उनके पास होना चाहिए इतनी दूर हूं।
 आज भगवान से दिल से प्रार्थना करती हूं मेरी नानी को स्वस्थ कर दे उनकी तकलीफें दूर कर दो भगवान। आप भी मेरी नानी के लिए प्रार्थना करें।

Tuesday, January 15, 2013

बस यादें रह जाती हैं


सोच हमें कहां कहां से घूमा के ले आती है. कहीं बैठे हैं और कहीं से घूम आते हैं. न जाने कैसी कैसी सोच
 अभी ऑफिस में बैठी हूं खाली पडा कॉफी का कप एक साइड पडा है अचानक मामाजी की याद आ गयी.
मेरी यादें तो धुंधला गयी पर सब बताते हैं बचपन में मैं उनके कितने क्‍लोज थी. अब भी वो मुझसे उसी तरह प्‍यार से मिलते हैं शायद मैं उनके चहेते बच्‍चों में से एक हूं.
 छुटपन में मैं और मेरे भाई उन्‍हें अंतर्देशीय में अपनी फरमाइशें लिख भेजते थे. लिस्‍ट काफी लंबी होती थी. उनका जवाब भी आता था. उस वक्‍त वो दिल्‍ली में पढाई के सिलसिले में रहा करते थे. कमाई तो थी नहीं सो छुटि़टयों में कुछ नहीं लेकर आते फिर भी हम खुश हो जाते थे उनसे मिलकर :)
आज वह भगवान की दया से काफी अच्‍छी जगह हैं और हमारी छोटी क्‍या बडी से बडी फरमाइश पूरी कर सकते हैं
पर फासले और रिश्‍ते कुछ इस कदर बदल गए कि अब हम उनसे कुछ कहने क्‍या एक फोन करने से पहले दस बार सोचते हैं बिजी होंगे या पता नहीं क्‍या सोचेंगे. मोबाइल पर नंबर सर्च करते करते एकाएक हाथ थम जाता है
 किस तरह रिश्‍ते बदलते हैं न जिंदगी में... भाई बहन जो साथ में लडते  हैं, चीजों पर हक जमाते हैं चीजें शेयर करते हैं आगे चलकर अपनी जिंदगी और जिम्‍मेदारियों में इस तरह व्‍यस्‍त हो जाते हैं कि रिश्‍तेदारों सा मिलना जुलना. जी चाह कर भी पहले की तरह सब नहीं हो पाताइसीलिए कहते हैं शायद बीता वक्‍त लौट कर नहीं आता
 बस यादें रह जाती हैं वो भी धीरे धीरे धुंधली सी हो जाती है, पर इन यादों के साथ आंखें जरूर नम होती हैं