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Thursday, August 9, 2012

तो क्‍या मैं भी देखूं टेढी नजर से...


मेरे करीबी और शुभचिंतक मुझसे हमेशा कहते हैं, जितने साफ नजरों से और साफ दिल से तुम दुनिया को देखती हो उतनी सीधी और साफ नहीं है तुम्‍हारे साथ. ...उस समय लगता था ऐसा नहीं है, अगर मैं साफ हूं तो सामने वाला भी... पर एक बार जो विश्‍वास उठा और कुछ ऐसा घटा जिसने मेरे विश्‍वास को हिला कर रख दिया. तो बस अब सोच लिया कि दुनिया को देखूंगी टेढी नजर से. पर शक है कि मेरी टेढी नजर उनके जैसी पैनी और धार वाली हो पाएगी या नहीं...क्‍योंकि किसी ने कहा है nature और signature कभी नहीं बदलता. सच में इतना टेढा सोचते हैं लोग अब जाना है आपके जज्‍बातों से खेलकर कब अपना उल्‍लू सीधा कर जाएं और आपको पता भी न चले. छोटी सी चीज में भी अपना फायदा. अब तो बस यही लगता है कि चाचा चौधरी से भी तेज दिमाग है इन लोगों का :) जो पल भर में सोच लेते हैं अगला कदम उठाने पर क्‍या फायदा मिलने वाला है. किसको हत्‍थे पर चढाउं, ओफो! दिमाग भन्‍ना जाता है सोच सोच कर... कुछ तो ऐसे हैं जिनसे मेरा रोज का सामना है... और शायद अब समझ गई हूं कि क्‍या बोलूंगी और वो क्‍या फायदा सोचेगे :) हां पर अपनी अक्‍ल पर शक भी रहता है:) इसलिए आजकल रिजर्व रहने लगी हूं. आप भी रहिए ऐसे लोगों से सतर्क :) मेरी दुआ तो यह है कि आपको ऐसे लोगों से पाला ही न पडे...