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Monday, November 14, 2011

सॉरी मम्मी...


मां मुझको अपनी आंचल में छुपा ले
गले से लगा ले कि और मेरा कोई नहीं
अब न सताऊंगा मुझे पास बुला ले
ऊंगली पकड़ के तेरी मां मैं चला हूं
तेरे बिना मुझको अब कौन संभाले
गले से लगा ले कि और मेरा कोई नहीं

ये गाना मुझे बहुत पसंद है... आज अनायास ही याद आ गया। एक और बात है मुझे अपनी मम्मी से माफी मांगने का मन कर रहा है, सीधा-सीधा तो बोल नहीं पाऊंगी। आज मेरी एक गलती की वजह से उन्हें काफी कुछ सुनना पड़ा है... वो दुखी हैं उनकी आवाज से मालूम होता है... सॉरी मम्मी।

Thursday, November 10, 2011

कौन सा कपड़ा पहन के गई मम्मा


मैंने अपनी जिंदगी में कई गलतियां की हैं पर सबक उनमें से कुछ ही गलतियों से लिया है। इसे मेरी सबसे बड़ी गलती कह सकते हैं कि सबक लेना जरूरी नहीं समझा...।
अभी मेरा बेटा मुझसे दूर है और कभी कभी इतनी बेचैनी सी उठती है कि लगता है उसे ले आऊं और भींच लूं ऐसे की अब हम दोनों कभी अलग न हो पाएं।
शायद सभी मां को ऐसे ही अनुभव होता हो। पर पता नहीं क्यों मुझे अपराधी सा अहसास होता है लगता है उससे माफी मांग लूं बेटा, गलती हो गई तुम्हें सोता छोड़ आई। बताया भी तो नहीं, कि जा रही हूं अब चार-पांच दिन बाद मिलूंगी।
जब दिल्ली पहुंच कर फोन किया तो उसने एक ही सवाल किया मम्मा तुम कौन सा कपड़ा पहन के चली गई... बस आंखें छलछला उठी। जबकि मुझसे ज्यादा सुरक्षित हाथों में है फिर भी ऐसा अहसास...। हमेशा दिल को लगता है कहीं उसे दिक्कत हो रही होगी।

कुछ ऐसे ही पलों में लिखी पंक्तियां जो अनायास ही दिल में घुमड़ती है :-
जब कोई अपना आपसे छल करे तो कैसा लगता है न...
जब कोई प्यार दिखाए पर उसका कपट दिख जाए तो कैसा लगता है न,
सब जानते हुए भी कुछ न कर पाने की मजबूरी, जैसे गले में कोई भारी गोला सा अटक गया हो,
वो उफ कर के रह जाना कैसा लगता है न...
वो रातों को खुद पर ग्लानि कर आंसू बहाना कैसा लगता है न...
हर बार खुद से यही वादा कि अब ऐसा नहीं होगा दोबारा...
फिर भी वही गलती दोहराना कैसा लगता है न...

Monday, November 7, 2011

...और कितने समझौते


समझौता एक बड़ा सवाल बन गया है, कितना भी भागो पीछे पीछे आ जाता है... मानो कह रहा हो कि नहीं छोडूंगा तुम्हारा साथ जब तक जिंदगी रहेगी।
एक ही शर्त पर छूटेगा हाथ जब तुम जिंदगी हार जाओ...। इतना जिद्दी तो मेरा ढाई साल का मासूम बेटा भी नहीं जिसे मैंने खुद से अलग किया है इसी समझौते को ढो रही हूं। फोन पर पूछा उसने कहां हो मम्मा...? आंख भर आई मेरी अब तक सुना था बस की कलेजा मुंह को आता है पर सच... अब जाकर महसूस हुआ है। बड़ी बेचैनी महसूस होती है लगता है बहुत बड़ी गलती हो गई जो उसे छोड़ आई।
जिंदगी कभी कभी कितना मजबूर कर देती है शायद समझौते पर ही जिंदगी चलती है नहीं तो पता नहीं हर कदम पर कितना बवाल हो।
पता नहीं ये सब के साथ होता है या केवल मेरे साथ ही हो रहा है...। बहुत बड़ा सवाल मुंह बाये सामने खड़ा है अभी तो आधी ही जिंदगी काटी है पता नहीं कितने और समझौते आगे मेरा इंतजार कर रहे हैं?