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Tuesday, November 28, 2017

एक कान से सुनिए और दूसरे से...



शो यानि दिखावा करना सबके बस का नहीं ... और मेरे तो बिल्कुल नहीं। पर जमाने के साथ चलते हुए इसकी कमी मुझे काफी खलती है। क्यों कि हर जगह इसकी जरूरत मुझे मुंह चिढ़ाती सी दिखती है।
कुछ दिनों पहले ही हमारी जानने वाली एक महिला हमसे टकराईं। यहां बता दूं कि वे खुद काफी टिप टॉप में रहती हैं यानि हमेशा बाल संवरे रहते हैं, आंखों में काजल होती है, होंठों पर लाल लिपस्टिक का रंग और कुल मिलाकर खूबसूरत भी हैं वो। शायद इसलिए किसी पर भी टिप्पणी करने का मौका अपने हाथों से जाने नहीं देती। जाहिर सी बात है मुझसे मिलते ही उन्हें अनगिनत मौके मिल जाते हैं।
ये सब भी इंटरटेनमेंट का हिस्सा है जो बोरियत भरी जिंदगी में हंसने का मौका देता है। इसलिए ही सोचा की आप सब के साथ शेयर करूं ताकि आप भी थोड़ा हंस लें। कुछ दिनों पहले ही वो मुझसे मिली थीं और मेरे ड्रेस से लेकर रबड़बैंड तक पर कमेंट कर दिया था। जैसे – वो हो सासू मां बाहर गयी हैं तो फैशनेबल ड्रेस डाल रही... रबड़बैंड तो मम्‍मियों के जमाने का लगाया है आपने... कहां से लायीं...। मुस्कुराती हुई मैं वहां से अपने काम के लिए आगे बढ़ गयी।
हालांकि शुरुआत में उनकी बातें बुरी लगी थी पर अब एक कान से सुनती हूं और दूसरे से निकाल देती हूं। उससे भी नहीं होता तो उनके जाते ही हवा में फूंक मारती हूं जोरदार ... नहीं समझे ... अरे, उड़ा देती हूं हवा में। जी हां हवा में। वैसे भी दिल्लीे की हवा अब साफ सुथरी कहां है।

Friday, October 13, 2017

बाज नहीं आओगे अपनी चालबाजियों से




ओह्ह चालबाजियां नहीं नादानियां हैं ये...
सामने वाला सोचता है कि उसकी चालाकी कोई नहीं समझ रहा...
कहां हो तुम, किस दुनिया में जी रहे हो...
सब समझ रहे हैं हम, तुम्हारी एक-एक चाल से वाकिफ हैं
जुदा है ये.. कि सब समझते हुए भी हमने तुम्हारी इस बेवकूफी का जवाब नहीं दिया
लेकिन जान लो कारण ऐसा कर उस निचले पायदान पर नहीं आना चाहते जहां तुम खड़े हो
कुछ नहीं कहते इसका मतलब बेवकूफ नहीं हैं हम...
अपने इर्द गिर्द तुम जैसे लोग ही तो भरे पड़े हैं काफी कुछ सीख लिया है
अब हंसी आती है कभी-कभी तुम जैसे लोगों की नादानियों पर सबको खाली हाथ ही जाना है...
फिर भी इल्तजा है मेरी- बची-खुची जिंदगी को दोजख न बनाओ।

Tuesday, July 25, 2017

भीख मांगने वाले भी देने लगे हैं धमकी...



भागा जा रहा है, क्यों भागा जा रहा है, एक-दो रुपया नहीं दे सकता क्या ... इन शब्दों के कानों में पड़ते ही, ध्या‍न टूटा तो देखती हूं कि 30-32 साल का एक शख्स अजीब से कपड़े पहने ऑटो ड्राइवर को धमकी सा दे रहा है।
यह दृश्य नोएडा सेक्टर 62, सुबह करीब 9 बजे का है जब मैं ऑफिस के लिए निकली। सवारी को उतारने भर के लिए ऑटो रुकी थी और फिर जैसे ही स्टार्ट हुई, सिर पर काला कपड़ा लपेटे,काले रंग का 30 के आसपास उम्र वाला एक शख्स लगभग डांटने के अंदाज में बोला, ‘भागा जा रहा है, भागा जा रहा है... ऑटो ड्राइवर को लगा शायद उसे भी जाना है इसलिए ऑटो रोक रहा है। लेकिन अगले ही पल ड्राइवर का भ्रम टूट गया जब उसने हाथ पसारते हुए कहा- एक दो रुपया तो देता जा। ड्राइवर समेत ऑटो पर सवार हम सवारियों को भी तेज हंसी आ गयी, शायद उन्होंने भी पहली बार इस तरह किसी को भीख मांगते देखा हो।

भीख मांगने वालों को आजतक मैंने रोते, गिड़गिड़ाते, दुआएं देते सुना था पर आज गुस्सें में पैसे मांगते देख हैरान रह गयी। ऑफिस आने के क्रम में करीब दस मिनट ऑटो और फिर रिक्शे़ का रास्ता है। सुबह इतनी हड़बडी होती है...। पर आज बार-बार यह दृश्यो मेरे आंखों के सामने आ रहा है तो सोचा अपने ब्लॉग में इसे दर्ज ही कर लूं।

Friday, July 14, 2017

न्यूट्रल होना चाहती हूं मैं...



अब आपकी तारीफ से मुझ पर कोई असर नहीं होता मतलब न निगेटिव न पॉजिटिव। न्यूट्रल वर्ड से वाकिफ ही होंगे chemistry में पढ़ा हो शायद और यदि नहीं पढ़ा तो मैं बता देती हूं, जिसपर किसी भी केमिकल रिएक्शकन का कोई असर नहीं होता उसका अपना अस्तिरत्व होता है बिल्कुल न्यूट्रल सा।
वैसे भी आपके और आपके पूरे परिवार से मैंने आज तक अपने लिए तारीफ के बोल बिल्कुल भी नहीं सुना है और अगर सुना भी है तो वह बेमतलब नहीं होता। यानि उसके पीछे कोई कारण होता है, या तो मुझे खुश करवाकर अपना काम साधना या फिर कोई काम करवाना।
खैर, अक्सर पत्नियां अपने पति से तारीफ सुनती हैं और खुश होती हैं, लेकिन मैं अपवाद हूं शायद। मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ कभी भी। हां हाल का एक वाकया याद है कि आपके सामने ही आपकी एक जूनियर कलीग लड़की ने मेरी तारीफ की थी, जिसपर आपने कहा अरे, किसी के सामने उसकी तारीफ नहीं करते। मैं बिल्कुील चौंक गयी थी उस पल को क्योंहकि दस साल होने को आए शादी के... अब तक आपने नहीं पहचाना मुझे तो अब क्या् पहचानेंगे। बस उस पल ही दिल से उम्‍मीद की वो डोर भी तोड़ दी जिसकी चाह थी कि कभी तो आप मेरे होंगे।
अब मैं खुश हूं तारीफ किया नहीं किया सब बराबर मेरे लिए। अब कोई उम्मीद नहीं रखना चाहती मैं आपसे और न आपके परिवार के किसी व्यक्ति से। बस रहना है आपके घर में जहां हर सांस पर यह अहसास दिलाया गया है कि तुम्हें ये करना है, ये नहीं करना है, इससे बात करनी है, इससे नहीं करनी है, ये खाना सही नहीं है...उफ कहीं पढ़ा था लड़कियों को जिंदगी में अपना घर नहीं मिलता चाहे वह सब कुछ न्यौैछावर क्यों न कर दे। अब इस बात का अहसास हो चला है।
इस पोस्ट को लिखते लिखते गले में एक गोला सा अटका हुआ मालूम हो रहा है, आंखों में पानी सा आ रहा है और जलन भी शायद नींद पूरी नहीं हुई है न इसलिए।

Tuesday, July 4, 2017

अब तक नहीं चिल्‍ला पायी...


आज सुबह जब जगी तो अलसाया सा मन हो रहा था पर सूरज की लाली आसमां पर दस्त क दे चुकी थी। एक मिनट की भी देरी करूं तो पता नहीं किसका क्या छूटे और कहां देर हो। बेटे का स्‍कूल , पति का ऑफिस और फिर मेरा ऑफिस... इसलिए आलस्य को त्याागने के लिए एक प्याली चाय ली और सोफे पर बैठ गयी।
खाली मन पता नहीं कहां कहां उड़ानें भरने लग जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ भी। बैठी तो थी सोफे पर मन के भीतर कुछ ऐसे लोग याद आए गए जिनकी एक भी बात याद करो तो मन अजीब हो जाए तभी मैंने अपने ख्यालों को झटके से उतार फेंका और सोचा- नहीं नहीं, सुबह ऐसे लोगों के साथ नहीं। दिल को समझाया कुछ अच्छा सोचो किसी अच्छे पल को याद करो। ऐसे इंसान के बारे में सोचो जिससे होठों पर मुस्कान आए दिल खुश हो और सुबह सुहानी हो जाए।

फिर दिमाग ढूंढने लगा ऐसे पल... मिल भी गए ऐसे लोग जो मेरा भला ही सोचते होंगे लेकिन उनकी खुशी के बजाए उनकी मौजूदा स्थिति से दिल दुखी हो गया। आस-पास कोई खुश नहीं दिखा। सब किसी न किसी चीज के लिए परेशान ही दिखे। क्यों हुआ ऐसा समझ नहीं आता...

प्याली की चाय के साथ सोचने का वक्‍त भी खत्म हो चला था, जुट गयी अपनी रोजमर्रा के काम में। लेकिन दोपहर के एक बज रहे हैं फिर से दिमाग में वही कोलाहल है कहां हैं खुश और सुखी लोग... सब ऊपर से हंसते हैं दिखावे की खुशी है आज सबके पास। मैं हर चीज समझती हूं... उनकी दिखावे की खुशी में मैं भी दिखावे की हंसी हंस लेती हूं पर मेरे मन के एक कोने में भी कचरा भरा पड़ा है।
कभी किसी ने मुझसे कहा था... तुम एक बार खुलकर चिल्लाओ अब मुझे लग रहा हर किसी को चिल्लाने की जरूरत हो गयी है। मन के भीतर जमी दर्द और दुख की परत शायद चिल्लाकर निकल जाए। अगर आप मेरा पोस्ट पढ़ रहे हैं तो आप भी एक बार खुलकर चिल्लाइए फिर देखिए मन कैसा हल्का‍ सा हो जाता है पर ये चिल्लाना भारी काम है बहुत भारी.... मैं अब तक चिल्‍ला नहीं पायी हूं

Saturday, January 28, 2017

आधी उम्र गुजर गई है...


जिंदगी की औसतन लंबाई 70 बरस मान कर चलिए क्योंंकि लेटेस्ट लाइफस्टांइल के अनुसार तो लंबाई को पूरा जी लें यही बहुत है...।
इसके अनुसार आधी उम्र गुजार दी है मैंने... आज उन गुजरे क्षणों पर अनायास ही नजर चली गयी। गुजरी जिंदगी के सारे पन्ने यूं ही फड़फड़ा रहे हैं। हालांकि कहने को तो मैंने कई पन्नों को फाड़ दिया है पर वास्तव में ऐसा नहीं है। ऑरिजिनल कॉपी मेरे मस्‍तिष्क के किसी कोने में पड़ी है, पुराने पेज पीले हो जाते हैं पर इसकी रंगत जस की तस है, हां थोड़ी सी धूल जम गयी है और रोज पलटा नहीं जाता है इसलिए आपस में चिपके हुए से हैं।

कभी फुर्सत से इन्हें एक एक कर पलटूंगी ...पता नहीं ये वाला फुर्सत कब मिले। सोच कर हंसी सी आ जाती है। मेरी जिंदगी का हरेक पन्नान अपनी सी कहानी लिए हुए है जिसमें कई कड़वी सच्चाेइयां हैं जिन्हेंं सबके सामने पढ़ भी न पाऊं।

पता नहीं कितनी ही परतें हैं। अब लग रहा कि बस मेरी उपरी जिंदगी ही सामान्यच सी बीती है गहरे कहीं अंधकार में कितनी ही सच्चा इयां दफन हैं और जिनसे यह जुड़ी है शायद वे भी इस वाकये को स्वीकार करने से मुकर जाएं या फिर मैं ही इनपर पड़ी धूल को झाड़ना न चाहूं। मैं उन लेखक और लेखिकाओं के हिम्मत की दाद देती हूं जिन्होंने अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं। मुझमें वो हिम्मंत इस जिंदगी में तो शायद ही आए।

Friday, January 27, 2017

नन्हे से फरिश्ते...


यादें धुंधली होती जा रही हैं। आज से ठीक चार माह बाद तुम आठ साल के हो जाओगे। तुम्हारे बचपन की उतनी बातें तो याद नहीं हैं मुझे, पर वो पल नहीं भूली जब पहली बार मुझे ऑपरेशन थियेटर में ही नन्हे से फरिश्ते को दिखाया था। और शायद जब तक जिंदगी है तक तक उस क्षण को भूल नहीं सकती। हरे रंग के टॉवल में गुलाबी रुई से रंगत वाला वह नन्हा मुन्ना लिपटा हुआ था।
ऑपरेशन थियेटर में बेड पर मुझे लिटा दिया गया...पेट पर से पर्दा डाल दिया। आधा अंग सुन्न कर दिया था पर मैं होशो हवास में थी। डॉक्टरों की आपसी बातचीत कान में पड़ रही थी तभी दूर से कही बच्चे के रोने की आवाज आयी। बेचैन सी मैंने डॉक्टर से पूछ डाला क्या है- मेरा मतलब था लड़का या लड़की। इतने दिनों से सस्पेंस जो बना था। डॉक्टर के हंसने की आवाज आयी रुको बेटा अभी पता चल जाएगा तुम्हें ।
इतना तो अहसास हो गया था कि भगवान ने मेरी झोली को भर दिया है। तभी हरे रंग के टॉवेल में लिपटा एक सुंदर सा नन्हाे मुन्ना बच्चे को मेरे पास ले आए और कहा देख लो... ‘गेस करो क्या है...’ मेरे होठों पर हंसी थिरक आयी मैंने कहा- ‘बेटी’ चूंकि दिल से चाहत थी कि बेटी आए। डॉक्टर ने कहा- उहूं ‘बेटा’। मैंने कहा ‘कोई ना, सुंदर है...’ और मुस्कुरा दी।
आज आठ साल होने को हैं पर तुम और प्यारे होते जा रहे हो... तुम्हारे बिना जीना मुश्किमल हो गया है अब भगवान तुम्हें मेरी आयु भी लगा दे, सारी खुशियां तुम्हें मिले... अच्छे इंसान बनो... कामयाबी कदम चूमे।
तुम्हारी मम्मू

Friday, January 8, 2016

पता नहीं कौन सी मजबूरी...


कौन है जो रोक लेता है राह, जब भी होती है पार जाने की चाह। एक लहर है जो सीने में है दबी, कभी कभी आता है उसमें उफान पर कोई है...यहां... इसी दुनिया में... मेरे आस-पास जिसने अटका रखा है... न निकलने पाती हूं... न समाने पाती हूं कब तक रहूंगी इस कदर... शायद यह खुद का बहाना है... न जाने का बाहर या पता नहीं कौन सी मजबूरी...

Friday, January 1, 2016

बीत गया एक साल और...


बीत गया एक साल और। हमेशा की तरह कुछ यादें जुड़ गयीं हमारी जिंदगी की डिक्‍शनरी में। आज से नया साल शुरू हो गया है। आप सभी को नये साल की ढेर सारी शुभकामनाएं। कल से ही फोन पर मैसेजेस की झड़ी सी लगी है। पर पता नहीं क्‍यों मेरा दिल इन सब मामलों में इतना उत्‍साहित क्‍यों नहीं है। लोग सेलिब्रेशन के लिए मौके तलाश रहे हैं पर मैं नहीं। मेरी चाहत है तो बस आराम से बैठने को कुछ पल मिल जाए... पर यह तो होने से रहा अब। आज गिने चुने लोगों को ही नये साल पर शुभकामनाएं देने को फोन किया वह भी पारंपरिक तौर पर आवश्‍यकता है इसलिए नहीं तो शायद यह भी नहीं करती बस अपनी मम्‍मी से बात करती और भाई-बहन से बस। दिल ही नहीं करता किसी से बात करने का। दो मिनट के लिए बात भी करूं तो उसमें कमेंट्स सुनने को मिल जाते हैं। इसलिए मेरा मन नहीं करता किसी से बात करने का। आज सुबह सुबह पता नहीं क्‍यों बीते वर्ष की झलक आंखों के सामने घूम गयी। काफी दौड़ती भागती रही हूं मैं इस साल, और अहसास भी नहीं मुझे, कहीं खुद के बारे में सोचना तो नहीं बंद कर दिया मैंने। खैर कोई नहीं आस पड़ोस खुश रहे तो आप भी खुश रहते हैं। और मेरी कोशिश रहती है कि खुश ही रहें सब लोग पर इस साल ने मुझे यह नया अनुभव दिया कि अब इतने से अगर कोई खुश नहीं तो अब इससे अधिक मैं कुछ नहीं कर सकती यानि सैचुरेशन प्‍वाइंट आ गया है। अब खत्‍म सब...। इसलिए नये साल में मैं खुद को शुभकामनाएं देती हूं, मुझे भगवान इंसानों को पहचानने की ताकत दे, लिहाज और आदर की वजह से जिन लोगों की गलत बातों का विरोध नहीं कर पायी हूं अब तक वो इस नये साल पर कर सकूं यानि स्‍वयं का भी अस्‍तित्‍व बनाउंं।

Friday, October 23, 2015

बचपन का दुर्गा पूजा


इस बार बचपन के दशहरे की खूब याद आयी। 6 साल के अपने बेटे को भी बताया। नवमी के दिन दशहरा का मेला घूमने जाया करती थी... पापा और भाई के साथ। पहले पापा पंडालों में घुमाते- जब उन्‍हें लगता कि अब बहुत हो गया तो पूछते अब चलें घर। हम दोनों भाई बहन भी हामी भर देते। पर उनसे डिमांड करने की हिम्‍मत न हममें थी और न मुझसे चार साल छोटे भाई में। पर पापा सब समझते थे। घुमाने के बाद हमें मिठाई की दुकान पर ले जाते और पूछते क्‍या चाहिए यानि कौन सी मिठाई पर मुझ समोसा बेहद प्रिय था। पापा को बोलती समोसा खाउंगी और वे कहते नहीं, आज के दिन अच्‍छा नहीं होता समोसा मिठाई खा लो। और हम दोनों को मिठाई मिल जाती। आज याद करती हूं तो याद नहीं आता कि पापा अपने लिए मिठाई लेते थे या नहीं। शायद नहीं ही लेते थे हां, घर के लिए पैक करवाते थे। इसके बाद बारी आती खिलौने के दुकान की। ज्‍यादा तो याद नहीं एक बार का याद है, भाई ने एक गुड्डा लिया था और मैंने शायद कोई इयररिंग। फिर वापस घर आ जाते। इसके बाद का याद नहीं कुछ। लेकिन वो याद काफी अच्‍छी है... और इसे भूलना भी नहीं चाहती, शायद कभी भुलूंगी भी नहीं।