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Saturday, January 28, 2017

आधी उम्र गुजर गई है...


जिंदगी की औसतन लंबाई 70 बरस मान कर चलिए क्योंंकि लेटेस्ट लाइफस्टांइल के अनुसार तो लंबाई को पूरा जी लें यही बहुत है...।
इसके अनुसार आधी उम्र गुजार दी है मैंने... आज उन गुजरे क्षणों पर अनायास ही नजर चली गयी। गुजरी जिंदगी के सारे पन्ने यूं ही फड़फड़ा रहे हैं। हालांकि कहने को तो मैंने कई पन्नों को फाड़ दिया है पर वास्तव में ऐसा नहीं है। ऑरिजिनल कॉपी मेरे मस्‍तिष्क के किसी कोने में पड़ी है, पुराने पेज पीले हो जाते हैं पर इसकी रंगत जस की तस है, हां थोड़ी सी धूल जम गयी है और रोज पलटा नहीं जाता है इसलिए आपस में चिपके हुए से हैं।

कभी फुर्सत से इन्हें एक एक कर पलटूंगी ...पता नहीं ये वाला फुर्सत कब मिले। सोच कर हंसी सी आ जाती है। मेरी जिंदगी का हरेक पन्नान अपनी सी कहानी लिए हुए है जिसमें कई कड़वी सच्चाेइयां हैं जिन्हेंं सबके सामने पढ़ भी न पाऊं।

पता नहीं कितनी ही परतें हैं। अब लग रहा कि बस मेरी उपरी जिंदगी ही सामान्यच सी बीती है गहरे कहीं अंधकार में कितनी ही सच्चा इयां दफन हैं और जिनसे यह जुड़ी है शायद वे भी इस वाकये को स्वीकार करने से मुकर जाएं या फिर मैं ही इनपर पड़ी धूल को झाड़ना न चाहूं। मैं उन लेखक और लेखिकाओं के हिम्मत की दाद देती हूं जिन्होंने अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं। मुझमें वो हिम्मंत इस जिंदगी में तो शायद ही आए।

Friday, January 27, 2017

नन्हे से फरिश्ते...


यादें धुंधली होती जा रही हैं। आज से ठीक चार माह बाद तुम आठ साल के हो जाओगे। तुम्हारे बचपन की उतनी बातें तो याद नहीं हैं मुझे, पर वो पल नहीं भूली जब पहली बार मुझे ऑपरेशन थियेटर में ही नन्हे से फरिश्ते को दिखाया था। और शायद जब तक जिंदगी है तक तक उस क्षण को भूल नहीं सकती। हरे रंग के टॉवल में गुलाबी रुई से रंगत वाला वह नन्हा मुन्ना लिपटा हुआ था।
ऑपरेशन थियेटर में बेड पर मुझे लिटा दिया गया...पेट पर से पर्दा डाल दिया। आधा अंग सुन्न कर दिया था पर मैं होशो हवास में थी। डॉक्टरों की आपसी बातचीत कान में पड़ रही थी तभी दूर से कही बच्चे के रोने की आवाज आयी। बेचैन सी मैंने डॉक्टर से पूछ डाला क्या है- मेरा मतलब था लड़का या लड़की। इतने दिनों से सस्पेंस जो बना था। डॉक्टर के हंसने की आवाज आयी रुको बेटा अभी पता चल जाएगा तुम्हें ।
इतना तो अहसास हो गया था कि भगवान ने मेरी झोली को भर दिया है। तभी हरे रंग के टॉवेल में लिपटा एक सुंदर सा नन्हाे मुन्ना बच्चे को मेरे पास ले आए और कहा देख लो... ‘गेस करो क्या है...’ मेरे होठों पर हंसी थिरक आयी मैंने कहा- ‘बेटी’ चूंकि दिल से चाहत थी कि बेटी आए। डॉक्टर ने कहा- उहूं ‘बेटा’। मैंने कहा ‘कोई ना, सुंदर है...’ और मुस्कुरा दी।
आज आठ साल होने को हैं पर तुम और प्यारे होते जा रहे हो... तुम्हारे बिना जीना मुश्किमल हो गया है अब भगवान तुम्हें मेरी आयु भी लगा दे, सारी खुशियां तुम्हें मिले... अच्छे इंसान बनो... कामयाबी कदम चूमे।
तुम्हारी मम्मू

Friday, January 8, 2016

पता नहीं कौन सी मजबूरी...


कौन है जो रोक लेता है राह, जब भी होती है पार जाने की चाह। एक लहर है जो सीने में है दबी, कभी कभी आता है उसमें उफान पर कोई है...यहां... इसी दुनिया में... मेरे आस-पास जिसने अटका रखा है... न निकलने पाती हूं... न समाने पाती हूं कब तक रहूंगी इस कदर... शायद यह खुद का बहाना है... न जाने का बाहर या पता नहीं कौन सी मजबूरी...

Friday, January 1, 2016

बीत गया एक साल और...


बीत गया एक साल और। हमेशा की तरह कुछ यादें जुड़ गयीं हमारी जिंदगी की डिक्‍शनरी में। आज से नया साल शुरू हो गया है। आप सभी को नये साल की ढेर सारी शुभकामनाएं। कल से ही फोन पर मैसेजेस की झड़ी सी लगी है। पर पता नहीं क्‍यों मेरा दिल इन सब मामलों में इतना उत्‍साहित क्‍यों नहीं है। लोग सेलिब्रेशन के लिए मौके तलाश रहे हैं पर मैं नहीं। मेरी चाहत है तो बस आराम से बैठने को कुछ पल मिल जाए... पर यह तो होने से रहा अब। आज गिने चुने लोगों को ही नये साल पर शुभकामनाएं देने को फोन किया वह भी पारंपरिक तौर पर आवश्‍यकता है इसलिए नहीं तो शायद यह भी नहीं करती बस अपनी मम्‍मी से बात करती और भाई-बहन से बस। दिल ही नहीं करता किसी से बात करने का। दो मिनट के लिए बात भी करूं तो उसमें कमेंट्स सुनने को मिल जाते हैं। इसलिए मेरा मन नहीं करता किसी से बात करने का। आज सुबह सुबह पता नहीं क्‍यों बीते वर्ष की झलक आंखों के सामने घूम गयी। काफी दौड़ती भागती रही हूं मैं इस साल, और अहसास भी नहीं मुझे, कहीं खुद के बारे में सोचना तो नहीं बंद कर दिया मैंने। खैर कोई नहीं आस पड़ोस खुश रहे तो आप भी खुश रहते हैं। और मेरी कोशिश रहती है कि खुश ही रहें सब लोग पर इस साल ने मुझे यह नया अनुभव दिया कि अब इतने से अगर कोई खुश नहीं तो अब इससे अधिक मैं कुछ नहीं कर सकती यानि सैचुरेशन प्‍वाइंट आ गया है। अब खत्‍म सब...। इसलिए नये साल में मैं खुद को शुभकामनाएं देती हूं, मुझे भगवान इंसानों को पहचानने की ताकत दे, लिहाज और आदर की वजह से जिन लोगों की गलत बातों का विरोध नहीं कर पायी हूं अब तक वो इस नये साल पर कर सकूं यानि स्‍वयं का भी अस्‍तित्‍व बनाउंं।

Friday, October 23, 2015

बचपन का दुर्गा पूजा


इस बार बचपन के दशहरे की खूब याद आयी। 6 साल के अपने बेटे को भी बताया। नवमी के दिन दशहरा का मेला घूमने जाया करती थी... पापा और भाई के साथ। पहले पापा पंडालों में घुमाते- जब उन्‍हें लगता कि अब बहुत हो गया तो पूछते अब चलें घर। हम दोनों भाई बहन भी हामी भर देते। पर उनसे डिमांड करने की हिम्‍मत न हममें थी और न मुझसे चार साल छोटे भाई में। पर पापा सब समझते थे। घुमाने के बाद हमें मिठाई की दुकान पर ले जाते और पूछते क्‍या चाहिए यानि कौन सी मिठाई पर मुझ समोसा बेहद प्रिय था। पापा को बोलती समोसा खाउंगी और वे कहते नहीं, आज के दिन अच्‍छा नहीं होता समोसा मिठाई खा लो। और हम दोनों को मिठाई मिल जाती। आज याद करती हूं तो याद नहीं आता कि पापा अपने लिए मिठाई लेते थे या नहीं। शायद नहीं ही लेते थे हां, घर के लिए पैक करवाते थे। इसके बाद बारी आती खिलौने के दुकान की। ज्‍यादा तो याद नहीं एक बार का याद है, भाई ने एक गुड्डा लिया था और मैंने शायद कोई इयररिंग। फिर वापस घर आ जाते। इसके बाद का याद नहीं कुछ। लेकिन वो याद काफी अच्‍छी है... और इसे भूलना भी नहीं चाहती, शायद कभी भुलूंगी भी नहीं।

Friday, July 24, 2015

हमेशा अलग ही रहा सुबह का रंग...

कहते हैं न कि सुबह हुई तो हर जगह उजियारा होगा और रात हुई तो सब जगह अंधेरा... पर ऐसा है क्‍या, मुझे नहीं लगता। मैं भारत और अमेरिका की बात नहीं कर रही कि यदि भारत में रात है तो अमेरिका में दिन होगा बल्‍कि मैं बात कर रही हूं इसी देश के अलग अलग घर के बारे में। मेरी सुबह हर घर में अलग सी रही है आज तक। कहने का अर्थ जब मम्‍मी के घर पर थी तो सुबह अलग ही थी यहां तक कि वो गंध भी अलग थी जो अब खोजे से भी नहीं मिल सकती शायद। हर उम्र में सुबह के मायने बदलते गए। रात भी अलग ही थी उस वक्‍त। मम्‍मी के साथ सोना और अगर हल्‍का सा बुखार चढ़ गया तब तो मेरे चेहरे को मम्‍मी अपने आंचल से ढक देती थी रात को सोते वक्‍त। उनके आंचल की खुश्‍बू कह लें या मम्‍मी का प्‍यार... बड़ा अच्‍छा होता था वो सब, उस वक्‍त तो ये सब नॉर्मल सा लगता था मतलब स्‍पेशल नहीं पर अब जब काफी दूर हूं और शायद ही वो ममता की छांव मिले तो अच्‍छा लगता है, याद आती है सारी बातें। बिना जिम्‍मेवारियों वाले दिन... आजादी का अहसास। सुबह तो उस वक्‍त भी उठती थी मैं... पढ़ाई की जिम्‍मेवारी भी थी। पर एक अलग सी गंध थी जो आज अभी लिखते वक्‍त भी मेरे नथुनों में समा सी गयी हैं। अभी के मुकाबले इतनी सुविधाएं नहीं थी न इतना बड़ा घर था पर खुशियां ही खुशियां थीं। छोटे भाई बहन का साथ था... यही बहुत था। सुबह की धूप एक ही कमरे में आती थी वो भी छोटी सी खिड़की से, आज हमारे बड़े घर की गैलरी में सुबह की धूप खूब अच्‍छे से आती है पर वो पहले वाला सुबह का रूप ही मिस करती हूं आज भी।

Wednesday, July 8, 2015

किससे बात करूं...

आज सुबह से इतना अच्छा मौसम... बादलों से घिरा आसमान... सूरज का तो पता नहीं कहीं... । पर मन पता नहीं क्यों अजीब सा हो रहा सोचा कहीं किसी से बात कर लूं तो शायद अच्छा महसूस हो। फोनबुक पर कंटैक्ट्स देखने का सिलसिला शुरू हुआ। किससे बात करूं..ऊं ऊं ऊं इससे... नहीं नहीं इससे अरे नहीं यह अपना गाना शुरू कर देगी किससे करूं कोई ऐसा दिखा नहीं जो हंस कर शायद बात कर ले और मेरा मूड सही हो जाए। सोचते सोचते पता ही नहीं लगा कितनी देर से ट्रैफिक में खड़ी हूं। दिल्ली का तो हाल ही बुरा है जरा सी बारिश हुई नहीं की जाम ही जाम। सोच-सोच के और हलकान हो गयी। 10 मिनट का रास्ता आज घंटे भर का बन गया है। अचानक से एक छवि जेहन में उतरी और तय कर लिया अभी इससे ही बात करूंगी मेरा मूड तो अच्छा होगा ही हंस भी लूंगी थोड़ा। साथ ही चिंता भी कि पता नहीं बात करने का उसका मूड हो न हो। फोन मिलाया तो बिजी...। फिर आॅफिस के काम में व्यास्ता हो गयी। दिल में भारीपन सा महसूस होता रहा। अचानक फोन की घंटी बजी... स्क्रीन पर नंबर और नाम देख दिल खुश हो गया। रिसीव करते ही आवाज सुनी तो बोला आज मूड ठीक नहीं जरा ट्यूलिप से बात करा दो... अरे मैं बताना तो भूल ही गयी ट्यूलिप के बारे में। 2 साल की नन्हीं सी गुड़िया है... मेरी भतीजी। हाल ही में एक महीने रह कर गयी है हमारे साथ, शायद इसलिए वो बातें भी कर लेती है हमसे। मीठी सी बातें होतीं हैं उसकी, पूरा वाक्य तो बोलती नहीं वो, हां कुछ शब्द जरूर बोलती है। बात हुई उससे थोड़ी सी ही क्यों्कि वह अपने खिलौनों में बिजी थी। पर मन अच्छा हो गया उसकी मीठी सी आवाज सुनकर। उसकी मम्मी भी इसमें उसकी मदद कर रही थी जैसे चेयर बोलो, म्या ऊं बोलो.... love u beta... god bless u.

Wednesday, April 15, 2015

उलझनें और कशमकश क्‍यूं...


मन का उचाट हो जाना, अजीब सा पल होता है... किसी भी काम में दिल नहीं लगता उस वक्‍त। कभी-कभी तो समझ ही नहीं आता कि ऐसा हो क्‍यूं रहा है। हर चीज अपने गति से सही है, फिर मन में इतनी उलझने और कशमकश क्‍यूं। बिना मतलब कोई बात दिल को चुभ जाती है, चाहे उसका कोई मतलब बने न बने।
और तो और इसे सुलझाना भी खुद ही है, किसी से शेयर करने पर भी यह निश्चित नहीं की आपके दिल का बोझ हल्‍का हो जाएगा। उल्‍टा और भारी हो जाए इसके 99% चांस हैं। इसलिए मैं भी सोच रही हूं,कि किसी से बताकर दिल को और भारी करने के बजाय इसे ऐसे ही छोड़ देती हूं, थोड़ा टाइम लगेगा पर विश्‍वास है किसी न किसी अच्‍छी बात से इस बात को सुकून मिलेगा ही।

Saturday, April 11, 2015

गुम हो गए हैं बेशुमार तारे...


इतना है तुमसे प्याेर मुझे मेरे राजदार, जितने की आसमां पर हैं तारे बेशुमार... कल सुबह ये खूबसूरत गाना रेडियो पर सुना और सोचने लगी बेशुमार तारे देखे तो जमाना हो गया। अब आसमान में इतने तारे कहां रह गए।
एक तो खुला आसमां देखने को नहीं मिलता दूसरा किसी के पास इसके लिए वक्त भी नहीं, पर कल गाने की पंक्ति जैसे मेरे जेहन में बस गयी थी, रात को जब घर में सब सो गए तो मैंने बालकनी से नजर आने वाले खुले आसमां की तरफ अपनी नजरें दौड़ाईं, बेशुमार का मतलब जो निकलता है उस तरह नहीं दिखे तारे जबकि बादल भी कहीं नहीं। मैंने सोचा हो सकता है यहां से ठीक से नजर न आ रहा हो, दूसरी वाली बालकनी से झांका पर वहां भी निराशा... कहीं भी बेशुमार तारे नजर नहीं आए। ऐसा क्याब हो गया है, कहां चले गए सब तारे... या हमारे आपाधापी की जिंदगी को देखते हुए दुखी हो गए हैं ये टिम टिम करते तारे... पता नहीं बचपन में गर्मियों के मौसम में नानी के यहां खुले आंगन में नानी के साथ चारपाई पर सोते हुए इन तारों को देखा करती थी, और नानी हमेशा बोलती थी वो सतभइया (सप्तचर्षि) तारे को मत देखना, अपशगुन होता है। पर कल आसमां में सबसे पहले वही दिखा क्यों कि बाकी सब न जाने कहां खो गए हैं...।

Monday, October 13, 2014

कहीं खो गया है मौसम का सुहावनापन


आज सुबह उठते ही आसमां में उमडते घुमडते बादलों को देखा. सीधा मन में आया कि हुदहुद का असर होगा. एक मिनट का समय लगा दिया होगा यह सोचने में। फिर जल्दी-जल्दी भागी किचन की ओर, बेटे को स्कूल जो भेजना होता है। उसके बाद अपनी और पति की तैयारी- भाग दौड़। अंतत: 8.20 पर निकल गई साथ में छाता रख लिया की कहीं बारिश में भीग न जाऊं। ट्रैफिक, भीड़ भाड़ का सामना करते हुए ऑफिस पहुंची। राहत का सांस लिया और पानी गटक गई। तभी एक कलीग जो मुश्किल से 22-23 की होगी, आकर बोलती है आज मौसम कितना सेक्सी और सुहाना है न! अरे, मेरे तो ध्यान में ही नहीं आया कि मौसम सुहाना हो रहा... पहले तो ऐसे मौसम में किलक उठती थी। दिल होता था कहीं घूम आऊं ...। सोचने को मजबूर हो गई- आखिर मेरे ध्यान से मौसम का सुहावनापन कहां गायब हो गया। उम्र का तकाजा है या जिंदगी की भाग दौड़ में इन सब चीजों से दूर जा रही हूं ... सुबह से सोच रही आखिर क्यों हुआ ऐसा...!